07/03/08

चिंतन ( दिखावा )

चिंतन आज का विचार
आज का चिंतन हम सब अपने अपने ढ्ग से अपने अपने भग्वान को याद करते हे, ओर करना भी चहिये, लेकिन फ़िर भी कुछ कमी रह जाती हे,इतना कुछ करने पर भी मन को शान्ति नही मिलती,इतने तीर्थ करने पर भी कही अधुरा पन लगता हे कयो...तो पढिये आज का चिंतन.
आज पुरे कस्वे राम पुर मे बहुत रोनक थी,लोगो ने आज सुबह सुबह अपने अपने काम पुरे किये ओर नहा धो कर साफ़ कपडे पहन कर श्रदा भाव से अपनी अपनी हेसियत के हिसाब से चढवा ले कर बाबा हारिचरन के आश्राम की ओर चल दिये,
हर कोई आश्रम मे जल्द से जल्द पहुचना चहाता था,आज बाबा जी ने ३ महीने के बाद समधि से बाहर आना था,इन ३ महिनो मे बाबा ने न कुछ खाया, ना पिया, ना किसी से बोले,ओर ना ही अंखे ही खोली,बस लोगो की भालई के लिये खुब तपस्या की.पिछले १५ दिनो से बाबा के चेले, आज के दिन का ढिढोरा पीट पीट कर लोगो को बता रहे थे, बाबा के गुण्गान करते थे,ओर सारा खर्च कस्वे के सेठ लोग कर रहे थे,ओर दिन रात बाबा के लगंर भी चल रहा था,
समय पर बाबा समधि से उठे, आखे खोली,इतनी भीड देख कर बाबा गदगद हो गये, फ़िर बाबा ने समने बेठे सेठ लोगो को,मन्त्रियो को,देखा,गाव के राजा को देखा, ओर आशीर्वाद की मुद्रा मे हाथ उठा कर सब को आशीर्वाद दिया,फ़िर हबन हुया, फ़िर बाबा ने भोग लगा कर सब को पाव छुने दिये,बस ऎसे ही शाम हो गई,सब लोग बहुत खुश थे बाबा से, बाते कर रहे थे अपास मे बाबा तो सक्षात भगवान हे, अरे कितना तेज हे, बाबा के चेहरे पर.. वगेरा वगेरा..
अब शाम को बाबा ने अपने चेलो से पुछा, बेटा सब आ गये ना, कोई छुटा तो नही, चेलो ने कहा बाबा कस्वे के साथ साथ आस पास बाले गाव के लोग भी बह्त आये नगर सेठ, ओर राजा सब आये, हां एक मोची नही आया, बाबा ने एक चेले को कहा जाओ उस मोची को भी ले आओ मेरे दर्शन कर के वो भी पवित्र हो जाये,एक चेला गया तो मोची कोई जुता ठीक कर रहा था, जब चेले ने बाबा की बात बताई तो, मोची ने मना कर दिया,वपिस आ कर चेले ने बाबा से वोही बात कही, बाबा ने सोचा शयाद गरीब मोची के पास चढावे के लिये कुछ नही शर्म से इस लिये इन्कार कर रहा हे, बाबा ने फ़िर एक चेले को भेजा चलो तुम मुफ़्त मे ही बिना चढावा चढाये दर्शन कर लो,
लेकिन इस बार भी मोची ने मना कर दिया,अब बाबा को थोडी बेचनी हुई,बाबा ने फ़िर से चेले को भेजा, चेले ने मोची से कहा चलो दर्शन कर लो बाबा तुमहे १००० अशर्फ़िया देगे, लेकिन मोची ने इस बार भी मना कर दिया,अब बाबा को बहुत गुस्सा आया, ओर बोले जब राजा ओर नगर सेठ तक मेरे चरण छुने आ सकते हे तो इस दो कोडी के मोची की यह हिम्म्त, अब बाबा बोले देखु तो सही यह कोन सा घमण्डी आदमी हे,चेलो से बोले चलो हम चलते हे मोची के पास.
मोची एक पेड के नीचे बेठा जुते ठोक रहा था, जब बाबा वहा गये ओर गुस्से से मोची को देखा तो हेरान रह गये,ओर पह्चान गये उस पर्मात्मा को ,ओर पेर पकड लिये, तो मोची रुपी भगवान बोले भगत तुम मेरी पुजा नही कर रहे थे , बल्कि मेरा नाम ले कर अपनी पुजा करवा रहे थे,यह समधि मेरे प्रकोप से बचाने के लिये नही अपने अराम के लिये,अपने नाम के लिये कर रहे थे,पिता अपने बच्चो पर क्भी प्रकोप नही करता.बस मुझे पखाण्डि नही सच्चे भगत ही पा सकते हे.
समाप्त

2 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!शिक्षाप्रद रचना के लिए आभार।

राज भाटिय़ा said...

आप का धन्यवाद टिपण्णी देने के लिये.