15/03/08

प्रायश्चित भाग ३

क्रमश से आगे...

प्रायश्चित

मदारीलाल ने भौंचक्के होकर कहाक्या आपकी मेज पर नोट रखे हुए थे? मुझे तो खबर ही नहीं। अभी पंडित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे, तब आपको कमरे में देखा। जब मुझे मालूम हुआ कि आप किसी से बातें करने चले गये हैं, वब दरवाजे बन्द करा दिये। क्या कुछ नोट नहीं मिल रहे है?सुबोध ऑंखें फैला कर बोलेअरे साहब, पूरे पॉँच हजार के है। अभी-अभी चेक भुनाया है।मदारीलाल ने सिर पीट कर कहापूरे पाँच हजार! हा भगवान! आपने मेज पर खूब देख लिया है?‘अजी पंद्रह मिनट से तलाश कर रहा हूँ।‘‘चपरासी से पूछ लिया कि कौन-कौन आया था?’‘आइए, जरा आप लोग भी तलाश कीजिए। मेरे तो होश उड़े हुए है।सारा दफ्तर सेक्रेटरी साहब के कमरे की तलाशी लेने लगा। मेज, आलमारियॉँ, संदूक सब देखे गये। रजिस्टरों के वर्क उलट-पुलट कर देंखे गये; मगर नोटों का कहीं पता नहीं। कोई उड़ा ले गया, अब इसमें कोइ्र शबहा था। सुबोध ने एक लम्बी सॉँस ली और कुर्सी पर बैठ गये। चेहरे का रंग फक हो गया। जर-सा मुँह निकल आया। इस समय कोई उन्हे देखत तो समझता कि महीनों से बीमार है।मदारीलाल ने सहानुभूति दिखाते हुए कहागजब हो गया और क्या! आज तक कभी ऐसा अंधेर हुआ था। मुझे यहॉँ काम करते दस साल हो गये, कभी धेले की चीज भी गायब हुई। मैं आपको पहले दिन सावधान कर देना चाहता था कि रूपये-पैसे के विषय में होशियार रहिएगा; मगर शुदनी थी, ख्याल रहा। जरूर बाहर से कोई आदमी आया और नोट उड़ा कर गायब हो गया। चपरासी का यही अपराध है कि उसने किसी को कमरे में जोने ही क्यों दिया। वह लाख कसम खाये कि बाहर से कोई नहीं आया; लेकिन में इसे मान नहीं सकता। यहॉँ से तो केवल पण्डित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे; मगर दरवाजे ही से झॉँक कर चले आये।सोहनलाल ने सफाई दीमैंने तो अन्दर कदम ही नहीं रखा, साहब! अपने जवान बेटे की कसम खाता हूँ, जो अन्दर कदम रखा भी हो।मदारीलाल ने माथा सिकोड़कर कहाआप व्यर्थ में कसम क्यों खाते हैं। कोई आपसे कुछ कहता? (सुबोध के कान में) बैंक में कुछ रूपये हों तो निकाल कर ठेकेदार को दे लिये जायँ, वरना बड़ी बदनामी होगी। नुकसान तो हो ही गया, अब उसके साथ अपमान क्यों हो।सुबोध ने करूण-स्वर में कहाबैंक में मुश्किल से दो-चार सौ रूपये होंगे, भाईजान! रूपये होते तो क्या चिन्ता थी। समझ लेता, जैसे पचीस हजार उड़ गये, वैसे ही तीस हजार भी उड़ गये। यहॉँ तो कफन को भी कौड़ी नहीं।उसी रात को सुबोधचन्द्र ने आत्महत्या कर ली। इतने रूपयों का प्रबन्ध करना उनके लिए कठिन था। मृत्यु के परदे के सिवा उन्हें अपनी वेदना, अपनी विवशता को छिपाने की और कोई आड़ थी।


दूसरे दिन प्रात: चपरासी ने मदारीलाल के घर पहुँच कर आवाज दीं मदारी को रात-भर नींद आयी थी। घबरा कर बाहर आय। चपरासी उन्हें देखते ही बोलाहुजूर! बड़ा गजब हो गया, सिकट्टरी साहब ने रात को गर्दन पर छुरी फेर ली।मदारीलाल की ऑंखे ऊपर चढ़ गयीं, मुँह फैल गया ओर सारी देह सिहर उठी, मानों उनका हाथ बिजली के तार पर पड़ गया हो।छुरी फेर ली?’‘जी हॉँ, आज सबेरे मालूम हुआ। पुलिसवाले जमा हैं। आपाके बुलाया है।‘‘लाश अभी पड़ी हुई हैं?‘जी हॉँ, अभी डाक्टरी होने वाली हैं।‘‘बहुत से लोग जमा हैं?’‘सब बड़े-बड़ अफसर जमा हैं। हुजूर, लहास की ओर ताकते नहीं बनता। कैसा भलामानुष हीरा आदमी था! सब लोग रो रहे हैं। छोडे-छोटे दो बच्चे हैं, एक सायानी लड़की हे ब्याहने लायक। बहू जी को लोग कितना रोक रहे हैं, पर बार-बार दौड़ कर लहास के पास जाती हैं। कोई ऐसा नहीं हे, जो रूमाल से ऑंखें पोछ रहा हो। अभी इतने ही दिन आये हुए, पर सबसे कितना मेल-जोल हो गया था। रूपये की तो कभी परवा ही नहीं थी। दिल दरियाब था!’मदारीलाल के सिर में चक्कर आने लगा। द्वारा की चौखट पकड़ कर अपने को सँभाल लेते, तो शायद गिर पड़ते। पूछाबहू जी बहुत रो रही थीं?‘कुछ पूछिए, हुजूर। पेड़ की पत्तियॉँ झड़ी जाती हैं। ऑंख फूल गर गूलर हो गयी है।‘‘कितने लड़के बतलाये तुमने?’‘हुजूर, दो लड़के हैं और एक लड़की।‘‘नोटों के बारे में भी बातचीत हो रही होगी?’‘जी हॉँ, सब लोग यही कहते हें कि दफ्तर के किसी आदमी का काम है। दारोगा जी तो सोहनलाल को गिरफ्तार करना चाहते थे; पर साइत आपसे सलाइ लेकर करेंगे। सिकट्टरी साहब तो लिख गए हैं कि मेरा किसी पर शक नहीं है।‘‘क्या सेक्रेटरी साहब कोई खत लिख कर छोड़ गये है?’‘हॉँ, मालूम होता है, छुरी चलाते बखत याद आयी कि शुबहे में दफ्तर के सब लोग पकड़ लिए जायेंगे। बस, कलक्टर साहब के नाम चिट्ठी लिख दी।

चिट्ठी में मेरे बारे में भी कुछ लिखा है? तुम्हें यक क्या मालूम होगा?’‘हुजूर, अब मैं क्या जानूँ, मुदा इतना सब लोग कहते थे कि आपकी बड़ी तारीफ लिखी है।मदारीलाल की सॉँस और तेज हो गयी। ऑंखें से ऑंसू की दो बड़ी-बड़ी बूँदे गिर पड़ी। ऑंखें पोंछतें हुए बोलेवे ओर मैं एक साथ के पढ़े थे, नन्दू! आठ-दस साल साथ रहा। साथ उठते-बैठते, साथ खाते, साथ खेलते। बस, इसी तरह रहते थे, जैसे दो सगे भाई रहते हों। खत में मेरी क्या तरीफ लिखी है? मगर तुम्हें क्या मालूम होगा?‘आप तो चल ही रहे है, देख लीजिएगा।‘‘कफन का इन्ताजाम हो गया है?’‘नही हुजूर, काह कि अभी लहास की डाक्टरी होगी। मुदा अब जल्दी चलिए। ऐसा हो, कोई दूसरा आदमी बुलाने आता हो।‘‘हमारे दफ्तर के सब लोग गये होंगे?’‘जी हॉँ; इस मुहल्लेवाले तो सभी थे।मदारीलाल जब सुबोधचन्द्र के घर पहुँचे, तब उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि सब लोग उनकी तरफ संदेह की ऑंखें से देख रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर ने तुरन्त उन्हें बुला कर कहाआप भी अपना बयान लिखा दें और सबके बयान तो लिख चुका हूँ।

यह रचना मुंशी प्रेमचन्द जी की हे

क्रमश....

2 comments:

mahendra mishra said...

बहुत अच्छी कहानी प्रस्तुत करने के लिए आभार

राज भाटिय़ा said...

मिश्रा जी बहुत धन्यवाद यु ही मेरी हिम्मत बढते रहे,