23/03/08

चिंतन लालची

आज का चिंतन ,यह कहानी के रुप मे मेने कभी पढा था, कि जो व्यक्ति अपनी इच्छा के विपरित जाता हे ओर अधिक से अधिक पाना चाहता हे, उस का कया हाल होता हे,
लालची
एक बार एक भिख्मंगा, सडक पर भीख मांग रहा था, ओर हर आने जाने वाले के बारे मे सोचता, देखो इस के पास कितना हे फ़िर भी इस का पेट नही भरता.. वगेरा वगेरा. तभी उसे लक्षमी जी के दर्शन हुये, लक्ष्मी जी ने उस भिखारी से कहा मांगो कया मंगते हॊ, लेकिन सोच कर मांगना, तुम्हारी एक ही इच्छा पुरी हो गी,भिखारी ने कहां मेरी झोली सोने से भर दो मां, लक्ष्मी देवी ने कहा ठीक हे, लेकिन एक भी सोने की ईट जमींन पर नही गिरनी चहिये,अगर एक भी सोने की ईट जमींन पर गिरी तो सब मिट्टी बन जाये गा, खोलो झोली अब भिखारी बाबा की झोली तो पहले ही फ़टी हुई थी, सो बाबा ने एक कोने को झोली का रुप दिया ओर झोली फ़ेला दी, अब सोने की कुछ ईटे झोली मे गिरी, मां ने कहा बेटा बस करो, नही तो ईटे नीचे गिर जाये गी, भिखारी बाबा को भी हम सब की तरह से लालच आगया, बोला मां थोडी ओर फ़िर से सोना बरसने लगा, मां ने फ़िर कहा बेटा बस करो, नही तो तुम्हारी झोली फ़ट जाये गी,लेकिन बाबा का लालाच तो ओर भी बढ गया, बोला मां ओर दो, फ़िर से ईटो का आना शुरु हो गया झोली तो पहले ही फ़टी थी, ओर छोटी थी, तभी १,२ ईटे जमींन पर गिरी, ओर बाबा की झोली मे मिट्टी ही मिट्टी भरी थी,बाबा बोले हे मां एक बार फ़िर से थोडी सी ईटे दे दो बस. लेकिन लक्ष्मी मां तो कब की जा चुकी थी,

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