01/03/08

हमारी आदर्श नारिया भाग ४

क्रमश से आगे...
झांसी की रानी ..
लूटमार से झांसी को बचा लेने के बाद रानी ने फिर से राज्य की व्यवस्थ्रा ओर सेना का संगठन करना शुरू कर दिया। सब जानते थे कि इस हत्याकांड के बाद झांसी को अंग्रेजों के तोप का सामना करना पड़ेगा। परन्तु अंग्रेजो के कोप की बारी आने मे अभी काफी दिन थे, क्योकि वे हर जगह मार खा रहे थे, विद्रोहियों कापलड़ा भारी पड़ रहा था। इसी बीच रानी के पास टीकमगढ़ के दीवान नत्थेखां की एक चिटठी आई। उसने सोचा कि मौका अच्छा है। झासी की बागडोर एक औरत के हाथों मे हैं। क्यो न हथिया लिया जाय? उसने लिख भेजा:
‘‘झांसी पहले ओरछे का हिस्सा थी। वह अनुचित ढंग से ओरछे से अलग कर ली गई। अब वह ओरछे को वापस मिलनी चाहिए। अंग्रेज जो पेशन रानी को देते थे, वह उन्हे मिलती रहेगी। किला, नगर और हथियार हमारे हवाले कर दिये जायं।’’ आगे-आगे चिटठी आई थी, पीछे-पीछे फौज लिए हुए दीवान नत्थेखा। रानी इस बात को मानने के लिए तैयार न थीं। वह लड़ाई के मैदान मे कूदपड़ी और ऐसी बहादुरी दिखाई कि बडे-बड़े लड़ाकू सरदर भी उनके सामने मात खा गये। देखते-देखते नत्थेखां की विशाल सेना तितर-बितर होकर भाग निकली। रानी की वीरता का सिक्का चारों ओर जम गया।
इसके कुछ समय बाद अंग्रेज जनरल की चिटठी आई। दीवान ने आकर बताया कि अंग्रेज जनरल ने रानी के अपने सब सरदारों के साथ सबकुछ उन्हें सौपने के लिए रखा था। दीवान ने पूछा, ‘‘क्या उत्तर दिया जाय?’’
रानी ने कहा, ‘‘दीवानजी, किले के फाटक बन्द करा दिजीये। मोर्चे-बंदी पक्की की जाय। मै धमकियों मे आनेवाली नही। मै अपनी झासी नहीं दूंगी।’’झांसी का मोर्चा अंग्रेजो के लिए लोहे का चना साबित हुआ। रानी को खबर मिली कि पीछे से तात्या सरदार अपनी फौज लेकर आ रहे है। रानी का मन खुशी से नाच उठा। इधर किले से गोलो की वर्षा होगी। उधर पीछे से तात्या टोपे की मार पड़ेगी। अंग्रेज बीच मेपड़कर पिसकर रह जायंगे।
परन्तु रानी की इच्छा पूरी न हो सकी। तात्या की सेना अंग्रेजों के सामने न ठहर सकी। इधर अंग्रेजो ने रानी के कुछ आदमियों कोफोड़कर बहुत-से भेदों की जानकारी कर ली। किला टूटूने लगा। रानी के सब सरदार एक-एक करके मारे गये। एक बार रानी ने सोचा किक अपने प्राण देदे, मगर दूसरे ही पल उन्होने यह विचार छोड़ दियां। रानी ने तय किया कि उन्हें क्या करना है, यानी आखिरी दम तक अंग्रेजो से लड़ना और लड़ते-लड़ते प्राण देदेना है। उन्होने दामोदरराव को अपनी पीठ पर बांधा। हाथ मे नंगी तलवार ली। घोड़े पर सवार हुई। कुछ सवारों को साथ लिया। किले का फाटक खुलवाया और तीर की तरह अंग्रेज-सेना को चीरती हुई निकल गईं। अंग्रेजो ने बहुत पीछा किया, मगर वे रानी की धूल भी नही पा सके। हार कर वे लौटे, झांसी में घुसे और वहां उन्होने मनमानी लूटमार की। औरतों, बूढो और बच्चों का उन लोगो ने बड़ी बेरहीमी से सड़को पर मारा। अंग्रेजों ने निहत्थो झांसी पर जो अत्याचार किया, उसके सामने अंग्रेज स्त्री-बच्चों के हत्याकांड की कहानी एकदम धुधलीपड़ गई।
यह कहानी सुबोध साहित्य माला से ली गई हे, इस के रचना कार हे श्रि ओंकारनाथ श्रीवास्तव,ओर मे उन का दिल से ध्न्यवाद करता हु
क्रमश...

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