02/03/08

हमारी आदर्श नारिया अन्तिम भाग

क्रमश से आगे...
झांसी की रानी (ऎसी नारिया जिन पर हमे मान हे )
रानी कालपी पहुची। वहां का भी बुरा हाल था। रावसाहब, जिनके हाथ मे सेना का भार था, चैन की बंसी बजाने मे मस्त थें। नतीजा यह हुआ कि उन्हे जल्दी ही कालपी से बोरिया-बिस्तर बांधने के लिए मजबूर होना पडा। रानी ने सलाह दी कि उन्हे ग्वलियर के किले पर अधिकार कर लेना चाहिए। वहां से जमकर लड़ाई की जा सकती थी। किसी का ध्यान इस ओर नही गया थां। सबने रानी की सूझबूझ की दाद दी। सेना के एक हिस्से का संचालन स्वयं रानी ने लिया और ग्वालियर का किला रावसाहब के हाथ् मे आ गया। जीत हो जाने पर रावसाहब पंत प्रधान पेशवा बनें।
रावसाहब को अब भी चेत नही हुआं। राज्य पाते ही सोई हुई लालसांएं फिर से जाग उठी। नाच-रंग आदि मे समय बीतने लगा। राज्य मे अव्यवस्था फैल गई और अंग्रेजों की फौज ने आकर ग्वालियर के किले को घेर लिया।
अब सब लोग घबराये, रानी जान गई कि यह आखिरी लड़ाई है। फिर भी उन्होने हिम्मत बंधाई। कहाकि बहादुरी से लड़ो तो अब भी हारी बाजी जीत सकते हो। एक बार फिर बहादुर कमर कसकर तैयार हो गये, मगर इस बार ग्वालियर के सरदरो ने ही धोखा दियां। मोर्चा टुट गया।
महाबलिदान की घड़ी आ गई। रानी ने अपने बचे-खुचे सरदारों को इकटठा किया और उनसे कहा कि अब मै आखिरी दांव लगाने जा रही हूं। याद रखना—मेरी लाश को फिरंगी हाथ न लगाने पावें। दामोदरराव को उन्होने अपने ,भरोसे के एक सरदार के हाथो सौप दिया।
दूर पर अंग्रेजी सेना का बिगुल उठा। रानी का अपना घोड़ा मर चुका था। उन्होने दूसरा घोड़ामांगा। सरादारों ने एक ऊंचा घोड़ा लाकर दे दिया। रानी उसपर सवार होकर चली। थोड़ी ही दूर जाने पर उन्हे मालूम हो गया कि घोड़ा अड़ियल है। एक नाले पर घोड़ा अड़ गया। रानी को अग्रेजों ने घेर लिया। एक निशाना उनकी आंख मे लगा। दूसरी चोट ने उनके प्राण हर लिये। तबतक सरादार आ पहुंचे। गोरे जान बचाकर भाग निकले।
सरदारों ने रानी को घोड़े पर से उतारा और चिता जलाकर उनकी दाह-क्रिया कर दी। रानी का सपना उस समय पूरा न होसका, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नही गया। वह स्वराज्य के महल की नीवं का पत्थर बनीं।
समाप्त

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