27/02/08

हमारी आदर्श नारिया भाग १

मेने बचपन मे एक कहानी पढी थी,ओर वो कहानी मेरे जेसे सभी बच्चो ने पढी होगी,आज अचानक वो कहानी मुझे याद आई,आप के समाने पेश हे वो कहानी ,हक्कीकत मे वो कोई कहानी नही, एक सच हे जो इतिहास के पन्नो पर छाप कर कहानी का रुप बन गया हे,मेरे देश की वो नारिया जिस पर हम सब मान कर सकते हे, आदर्श नारिया....
यह कहानी सुबोध साहित्य माला से ली गई हे, इस के रचना कार हे श्रि ओंकारनाथ श्रीवास्तव,ओर मे उन का दिल से ध्न्यवाद करता हु.
झांसी की रानी
लक्ष्मीबाई का बचपनक नाम मनूबाई था। प्यार में सब उसे ‘छबीली’ कहते थे। यही बालिका मनूबाई आगे चलकर महारानी लक्ष्मीबाई के नाम से इतिहास मे मशहूर हुई। मनूबाई के काका का नाम मोरोपंत ताम्बे था। मारोपंत बिठूर के पेशवा बाजीराव के साये मे रहते थे। बाजीराव मोरापंत से बराबरी का व्यवहार करते थे, फिर भी अगर ऊंच-नीच का फासला होता है तो वह कभी-न-कभी सामने आ ही जाता है। पेशवा के दोनो बेटे नानासाहब और रावसाहब व्यवहार मे उनके साथ चूक कर जाते थे।एक बार बिठूर मे एक पण्डितजी आये हुए थे। पण्डितजी जगह-जगह घूमा करते थे।
लोग अपनी-अपनी कन्याओ के लिए उनसे वर पूछा करते थे। संयोग से उनकी भेंट मोरेपंत ने मनूबाई के लिए वर बताने को कहा। मनू भी खेलती-कूदती वही आ पहुंची। पण्डितजी ने मनूबाई को देखा तो देखते ही रह गयें। थोड़ी देर बाद मरोपंत से बोले, ‘‘चिंता न करो, मोरोपंत, तुम्हारी बेटी बहुत बड़ा भाग्य लेकर आई है।’’
परन्तु इसके बाद जो घटना घटी, उसके बारे मे तो मोरोपंत ने सपने मे भी नही सोचा था। झांसी के राजा गंगाधरराव ने मनूबाई के साथ विवाह करने का संदेश भेजा। जो मनूबाई बिठूर जैसी छोटी रियासत के स्वामी के आश्रित मोरोपंत की कन्या थी, वही अब झांसी-जैसे बड़े राज्य की महारानी होने जा रही थी! अब ओर खुशी की लहर दौड़ गई। सम्बनध पक्का हुआ और ब्याह हो गया।
झांसी के रिवाज के अनुसार उनका नया नाम महारानी लक्ष्मीबाई रखा॥ लक्ष्मीबाई ने झांसी मे एक नये जीवन की शुरूआत कर दी। महाराज गंगाधरराव कला-प्रेमी थे, इसलिए अब तक झांसी मे नाच-रंग, संगीत-नाटक की धूम थी। परन्तु रान की निगाह बड़ी पैनी थी। वह अंग्रेजों की बढ़ती हुई ताकत को देख रही थी ओर जानती थी कि एक-न-एक दिन झांसी को अंग्रेजो से मुठभेड़ करनी
पड़ेगी। इसलिए उन्होने झांसी के लोगो मे उत्साह और वीरता पैदा करने की बीड़ा उठाया। सबसे अधिक अचरज का काम उन्होने यह किया कि अपनी दासियों, नाचने-गानेवालियों तथा नगर की सब नरियों की मदद से स्त्रियों की एक पल्टन तैयार कर दी।
क्रमश...

4 comments:

mamta said...

अच्छा है आप बचपन मे पढी कहानी की याद दिला रहे है।अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

परमजीत बाली said...

अच्छी शुरूआत की है जारी रखे।

राज भाटिय़ा said...

टिपण्णी के लिये आप सब का धन्यवाद

Lavanyam - Antarman said...

छबीली से झाँसी की वीराँगना की शौर्य गाथा को हिन्दोस्तान हमेशा गर्व से याद करेगा जैसा कि यहाँ मेरे चाचाजी श्री ओम्कार्नाथ श्रीवास्तव जी के याद किया है -
आपको बतला दूँ कि अम्कार्नाथ जी बम्बई, हमारे यहाँ अक्सर आते थे और बाद मेँ वे बीबीसी लँदन की हिन्दी सेवा से जुड गये थे.उनकी पत्नी, कीर्ति चौधरी जी भी अच्छी कवियत्री हैँ
-- लावण्या