25/02/08

स्वामिनी भाग ३

क्रमश से आगे.....
स्वामिनी
खुद पहले भाई की निगरानी में काम करता रहा। बाद को बाप की निगरानी के काम करने लगा। खेती का तार भी न जानता था। वही मजूर उसके यहॉं टिकते थे, जो मेहनत नहीं, खुशामद करने में कुशल होते थे, इसलिए प्‍यारी को अब दिन में दो-चार चक्‍कर हार के भी लगाना पड़ता। कहने को अब वह अब भी मालकिन थी, पर वास्‍तव में घर-भर की सेविका थी। मजूर भी उससे त्‍योरियॉँ बदलते, जमींदार का प्‍यादा भी उसी पर धौंस जमाता। भोजन में किफायत करनी पड़ती; लड़कों को तो जीतनी बार मॉंगे, उतनी बार कुछ-न-कुछ चाहिए। दुलारी तो लड़कौरी थी, उसे भरपूर भोजन चाहिए। मथुरा घर का सरदार था, उसके इस अधिकार को कौन छीन सकता था? मजूर भला क्‍यों रियायत करने लगे थे। सारी कसर प्‍यारी पर निकलती थी। वही एक फालतू चीज थी; अगर आधा पेट खाए, तो किसी को हानि न हो सकती थी। तीस वर्ष की अवस्‍था में उसके बाल पक गए, कमर झुक गई, ऑंखों की जोत कम हो गई; मगर वह प्रसन्‍न थी। स्‍वामितव का गौरव इन सारे जख्‍मों पर मरहम का काम करता था।एक दिन मथुरा ने कहा—भाभी, अब तो कहीं परदेश जाने का जी होता है। यहॉं तो कमाई में बरकत नहीं। किसी तरह पेट की रोटी चल जाती है। वह भी रो-धोकर। कई आदमी पूरब से आये हैं। वे कहते हैं, वहॉं दो-तीन रूपये रोज की मजदूरी हो जाती है। चार-पॉंच साल भी रह गया, तो मालामाल हो जाऊंगा। अब आगे लड़के-बाले हुए, इनके लिए कुछ तो करना ही चाहिए।दुलारी ने समर्थन किया—हाथ में चार पैसे होंगे, लड़कों को पढ़ाऍंगे-लिखाऍंगे। हमारी तो किसी तरह कट गई, लड़कों को तो आदमी बनाना है।प्‍यारी यह प्रस्‍ताव सुनकर अवाक् रह गई। उनका मुंह ताकने लगी। इसके पहले इस तर‍ह की बातचीत कभी न हुई थी। यह धुन केसे सवार हो गई? उसे संदेह हुआ, शायद मेरे कारण यह भावना उत्‍पन्‍न हुई। बोली—मैं तो जाने को न कहूँगी, आगे जैसी इच्‍छा हो। लड़कों को पढ़ाने-लिखाने के लिए यहां भी तो मदरसा है। फिर क्‍या नित्‍य यही दिन बने रहेंगे। दो-तीन साल भी खेती बन गई, तो सब कुछ हो जाएगा।मथुरा—इतने दिन खेती करते हो गए, जब अब तक न बनी, तो अब क्‍या बन जाएगी! इस तरह एक दिन चल देंगे, मन-की-मन में रह जाएगी। फिर अब पौरूख भी तो थक रहा हैद्य यह खेती कौन संभालेगा। लड़कों को मैं चक्‍की में जोतर उनकी जिन्‍दगी नहीं खराब करना चाहता।प्‍यारी ने ऑंखों में ऑंसू लाकर कहा-भैया, घर पर जब तक आधी मिले, सारी के लिए न धावना चाहिए, अगर मेरी ओर से कोई बात हो, तो अपना घर-बार अपने हाथ में करो, मुझे एक टुकड़ा दे देना, पड़ी रहूंगी।मथुरा आर्द्र कंठ होकर बोला- भाभी, यह तुम क्‍या कहती हो। तुम्‍हारे ही सॅंभाले यह घर अब तक चला है, नहीं रसातल में चला गया होता। इस गिरस्‍ती के पीछे तुमने अपने को मिटटी में मिला दिया, अपनी देह घुला डाली। मैं अंधा नहीं हूं। सब कुछ समझता हुं। हम लोगों को जाने दो। भगवान ने चाहा, तो घर ‍पिर संभल जायगा। तुम्‍हारे लिए हम बराबर खरच-बरच भेजते रहेंगे।प्‍यारी ने कहा-ऐसी ही है तो तुम चले जाआ, बाल-बच्‍चों को कहॉं-कहॉं बॉंधे पिरोगे।दुलारी बोली-यह कैसे हो सकता है बहन, यहॉं देहात में लड़के पढ़े-लिखेंगे। बच्‍चों के बिना इनका जी भी वहॉं न लगेगा। दौड-दौड़कर घर आऍंगे और सारी कमाई रेल खा जाएगी। परदेश में अकेले जितना खरचा होगा, उतने में सारा घर आराम से रहेगा।प्‍यारी बोली-तो मैं ही यहॉं रहकर क्‍या करूंगी। मुझे भी लेते चलो।दुलारी उसे साथ ले चलने को तेयार न थी। कुछ दिन का आनंद उठाना चाहती थी, अगर परदेश में भी यह बंधन रहा, तो जाने से फायदा ही क्‍या। बोली-बहन, तुम चलतीं तो क्‍या बात थी, लेकिन पिर यहॉं का कारोबार तो चौपट हो जाएगा। तुम तो कुछ-न-कुछ देखभाल करती ही रहोगी।प्रस्‍थापन की तिथि के एक दिन पहले ही रामप्‍यारी ने रात-भर जागकर हलुआ और पूरियॉं पकायीं। जब से इस घर में आयी, कभी एक दिन के लिए अकेले रहने का अवसर नहीं आया। दोनों बहनें सदा साथ रहीं। आज उस भयंकर अवसर को सामने आते देखकर प्‍यारी का दिल बैठा जाता था। वह देखती थी, मथुरा प्रसन्‍न है, बाल-वृन्‍द यात्रा के आनंद में खाना-पीना तक भूले हुए हैं, तो उसके जी में आता, वह भी इसी भॉंति निर्द्वन्‍द रहे, मोह और ममता को पैरों से कुचल डाले, किन्‍तु वह ममता जिस खाद्य को खा-खाकर पली थी, उसे अपने सामने से हटाए जाते देखकर क्षुब्‍ध होने से न रूकती थी, दुलारी तो इस तरह निश्‍िचंत होकर बैठी थी, मानो कोई मेला देखने जा रही है। नई-नई चीजों को देखने, नई दुनिया में विचरने की उत्‍सुक्‍ता ने उसे क्रियाशून्‍य-सा कर दिया था। प्‍यारी के सिरे सारे प्रबंध का भार था। धोबी के घर सेसब कपड़े आए हैं, या नहीं, कौन-कौन-से बरतन साथ जाऍंगे, सफर-खर्च के लिए कितने रूपये की जरूरत होगी। एक बच्‍चे को खॉंसी आ रही थी, दूसरे को कई दिन से दस्‍त आ रहे थे, उन दोनों की औषधियों को पीसना-कूटना आदि सैकड़ों ही काम व्‍यस्‍त किए हुए थे। लड़कौरी न होकर भी वह बच्‍चों के लालन-पोषण में दुलारी से कुशल थी। ‘देखो, बच्‍चों को बहुत मारना-पीटना मत। मारने से बच्‍चे जिद्दी या बेहया हो जाते हैं। बच्‍चों के साथ आदमी को बच्‍चा बन जाना पड़ता है। जो तुम चाहो कि हम आराम से पड़े रहें और बच्‍चे चुपचाप बैठे रहें, हाथ-पैर न हिलाऍं, तो यह हो नहीं सकता। बच्‍चे तो स्‍वभाव के चंचल होते हैं। उन्‍हें किसी-न-किसी काम में फॅंसाए रखो। धेले का खिलौना हजार घुड़कियों से बढ़कर होता है।‘ दुलारी इन उपदेशों को इस तरह बेमन होकर सुनती थी, मानों कोई सनककर बक रहा हो।विदाई का दिन प्‍यारी के लिए परीक्षा का दिन था। उसके जी में आता था कहीं चली जाए, जिसमें वह दृश्‍य देखना न पड़े। हां। घड़ी-भर में यह घर सूना हो जाएगा। वह दिन-भर घर में अकेली पड़ी रहेगी। किससे हॅंसेगी-बोलेगी। यह सोचकर उसका हृदय कॉंप जाता था। ज्‍यों-ज्‍यों समय निकट आता था, उसकी वृतियां शिथिल होती जातीं थीं।वह कोई काम करते-करते जैसे खो जाती थी और अपलक नेत्रों से किसी वस्‍तु को ताकने लगती। कभी अवसर पाकर एकांत में जाकर थोड़ा-सा रो आती थी। मन को समझा रही थी, वह लोग अपने होते तो क्‍या इस तरह चले जाते। यह तो मानने का नाता है, किसी पर कोई जबरदस्‍ती है। दूसरों के लिए कितना ही मरो, तो भी अपने नहीं होते। पानी तेल में कितना ही मिले, पिर भी अलग ही रहेगा।बच्‍चे नए-नए कुरते पहने, नवाब बने घूत रहे थे। प्‍यारी उन्‍हें प्‍यार करने के लिए गोद लेना चाहती, तो रोने का-सा मुंह बनाकर छुड़ाकर भाग जाते। वह क्‍या जानती थी कि ऐसे अवसर पर बहुधा अपने बच्‍चे भी निष्‍ठुर हो जाते हैं।दस बजते-बजते द्वार पर बैलगाड़ी आ गई। लउ़के पहले ही से उस पर जा बैठे। गॉंव के कितने स्‍त्री-पुरूष मिलने आये। प्‍यारी को इस समय उनका आना बुरा लग रहा था। वह दुलारी से थोड़ी देर एकांत गले मिलकर रोना चाहती थी, मथुरा से हाथ जोड़कर कहना चाहती थी, मेंरी खोज-खबर लेते रहना, तुम्‍हारे सिवा मेंरा संसार में कौन है, लेकिन इस भम्‍भड़ में उसको इन बातों का मौका न मिला। मथुरा और दुलारी दोनों गाड़ी में जा बैठे और प्‍यारी द्वार पर रोती खड़ी रह गई। वह इतनी विहृवल थी कि गॉंव के बाहर तक पहुंचाने की भी उसे सुधि न रही।कई दिन तक प्‍यारी मूर्छित भी पड़ी रही। न घर से निकली, न चुल्‍हा जलाया, न हाथ-मुंह धोया। उसका हलवाहा जोखू बार-बार आकर कहता ‘मालकिन, उठो, मुंह-हाथ धाओ, कुछ खाओ-पियो। कब तक इस तरह पड़ी रहोगी। इस तरह की तसल्‍ली गॉंव की और स्‍ित्रयॉं भी देती थीं। पर उनकी तसल्‍ली में एक प्रकार की ईर्ष्‍या का भाव छिपा हुआ जान पड़ता था।
क्रमश......

1 comment:

कुन्नू सिंह said...

वैसे मै दिल्ली मे "रोहिनि" मे रह्ता हु कहीये तो ब्लोग मे पोस्ट कर के भेज देता हु। और अगर दिल्ली आना असंभव हो तो ताले को तोड भि शकते हैं।