23/08/08

बहादुर बच्चा

बचपन मे पढी एक कहानी मुझे याद आ गई, ओर सोचा आप सब से बाटं ले,काश हम सब ऎसे ही हो जाये.... तो पढिये वो कहानी जो मेने बचपन मे पढी थी।

सर्दियो के दिन से, एक बालक अपने गांव से अकेले ही स्कुल जा रहा था, उस के रास्ते रेल की पटरिया भी आती थी, ओर वह हमेशा की तरह से आज भी उन पटरियो प्र मस्ती से चला जा रहा था, कि उस ने देखा एक जगह पर पटरी उखडी पडी हे,ओर बालक को पता था,कि रोजाना आने वाली गाडी थोडी ही देर मे आने वाली हे.

ओर अगर वह गाडी यहां से गुजरी तो एक बहुत ही भंयकर दुर्घटना घट सकती हे, उस बालक ने बहुत सोचा की मे केसे रोकू इस रेल को, स्टेशन भी दुर हे, तभी उसे दुर से गाडी आती दिखाई दी, ओर बालक ने झट से आपनी कमीज उतार कर उसे हवा मे लहराने लगा, ओर जोर जोर से चिल्लाने लगा साथ साथ मे गाडी की तरफ़ दोनो पटरियो के बीच मे भगने लगा, उस बालक को पता था कि इस तरह से अगर गाडी ना रुकी तो उस क मरना निश्चित हे, लेकिन वह बालक चाहता था, उन हजारो यात्रियो को बचाना, जिन मे बच्चे , बुढे, ओरते थी,

अब गाडी काफ़ी धीरे धीरे चलने लगी थी, शायद रेल के चालक ने बच्चे को देख लिया था, फ़िर रेल रुक गई ओर उस के चालक ने बच्चे से गुस्से मे कहा यह कोई खेलने की जगह नही, लेकिन जब बच्चे ने उस चालक को पुरी बात बताई ओर वह जगह दिखाई तो , चालक समेत सभी यात्रियो ने बच्चे का बहुत बहुत धन्यवाद किया.

यह घटना एक सच्ची घटना हे, ओर गाजी पुर स्टेश्न के पास की हे,ओर इस बच्चे का नाम अक्षय हे, ओर यह बात १९५६ सन की हे, उस समय हमारे राष्ट्र्पति राजेन्द्र प्रसाद जी थे, ओर उन्होने अपने हाथो से इस बहादुर बच्चे को अशोक चक्र दे कर सम्मानित किया था.

काश हम सब इस बालक की तरह से दुसरो का सोचे , तो हमारे देश मे नफ़रत बचेगी ही नही,अभी तो हम सब को अपनी अपनी ही नही ,अपने आने वाली दस पीढीयो तक की फ़िक्र हे,बाकी जाये भाड मे, हम कितने खुदगर्ज बन गये हे ?

14 comments:

Anil Pusadkar said...

naman aapka.jo aap door bauth kar desh ke liye sochte hain yanha to fursat hi nahi adhikaansh logo ko.sach kaha aapne khabar pal ki nahi aur saman umr bhar ka ikattha karne me lage hai log apna,apni dus pidhi ke intezam me andho ki tarah daud rahe hain.behatarin post ek bar fir aabhar aankh kholne ke prayas ke liye,ye yatra jaari rahe

संगीता पुरी said...

यह कहानी तो मैंने भी सुनी थी , बचपन में लेकिन पता नहीं था कि यह एक सत्य घटना है। जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई।

vineeta said...

सही कहा राज भाई, आज ज़माना पहले अपनी परवाह करता और बाद में अपनों की. बाकी सब भाड़ मैं जायें तो उसे क्या. ये कहानी मैंने भी पढ़ी है.

अनुराग said...

hamne bhi ye kahani padhi thi...ab dhundhla si gayi thi...yaad dilane ke liye shukriya....

रश्मि प्रभा said...

in prerak kahaniyon se aapne ek halki jyot jalaai hai,vishwaas hai...prakash badhta jayega...
bahut himmatwali kahani hai,veerta nishal hriday me hi basti hai

P. C. Rampuria said...

बहुत प्रेरक प्रसंग है ! बस आप तो हम बच्चों
को ये प्रसंग सुनाते चलिए , जिससे हमारी
बुद्धि भ्रभित ना हो और हम रास्ते से भटके नही !
धन्यवाद !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भाटिया जी, यह तो बहुत ही प्रेरक प्रसंग है. आपने ठीक कहा कि काश हम सब इस बालक जैसी वीर और परोपकारी सोच रख पायें. साधुवाद!

महेंद्र मिश्रा said...

maine bhi bachapan me isi tarah ki kahani khoob padhi hai . ramoo naam ka ladaka tha jab usane train ki patari tooti dekhi to rail ko ata dekh apni lal rang ki shirt utar kar hath me laharata hua train ki or doud pada or usane hajaro logo ki jaan bacha di . raaj ji apne bachapan ki yaade fir se tarotaja kar di . dhanyawaad.

अभिषेक ओझा said...

ये कहानी तो मैंने भी पढ़ी है... फिर से पढ़ के अच्छी लगी.

Gyandutt Pandey said...

साल में कई अवसर आते हैं जब हम रेल सेफ्टी में जन योगदान के आभारी होते हैं।
आपने संस्मरण बता बहुत अच्छा किया।

सतीश सक्सेना said...

पुरानी याद दिला दी. राज भाई ! काश फिर कहानी सुनने और सुनाने का ज़माना लौट आए राज भाई !

P. C. Rampuria said...

आदरणीय भाटिया जी
परिवार एवं इष्ट मित्रों सहित आपको जन्माष्टमी पर्व की
बधाई एवं शुभकामनाएं ! कन्हैया इस साल में आपकी
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करे ! आज की यही प्रार्थना
कृष्ण-कन्हैया से है !

सतीश पंचम said...

ये कहानी पहले कहीं मैंने भी पढ़ी है... फिर से याद आ गई......कहां की और कब की घटना है ये पता नहीं था, आज इतने साल बाद जानकर अच्छा लगा।

महेंद्र मिश्रा said...

आपको जन्माष्टमी पर्व की
बधाई एवं शुभकामनाएं