04/03/08

मे ओर वो लड्किया

बात बहुत पुरानी हे,लेकिन उसे कभी भूल नही सकता,सन १९६५-६६ के बीच की बात होगी, पापा की तब्दीली आगरा से दिल्ली हुई,ओर सब को दिल्ली मे पापा के साथ ही आना पढा,पापा को मोती बाग ( अब याद नही पार्ट १ या २ )मे एक सरकारी मकान मिला,३ कमरे, बाल्कोनी,उपर छत पर भी काफ़ी जगह, मेरा स्कुल भी बिलकुल सामने, सब बहुत अच्छा था,लेकिन ३ महिने के बाद भी कोई दोस्त नही था,फ़िर पता नही केसे बहुत से दोस्त बन गये, नये दोस्त नई शरारते,
सईकिल चलानी तो हम ने आगरा मे ही सीख ली थी, लेकिन वो वाला ढ्ग थोडा अजीब था,एक हाथ से साईकिल के हेण्डल कॊ दुसरे हाथ से गद्दी के आगे जो ड्ण्डा लगा होता हे वहां से हाथ डाल कर , ओर उस डण्डे के नीचे से दोनो टांगे डाल कर, पता नही केसे साईकिल चल्ती थी, लेकिन चलती थी,अब दिल्ली मे थोडे बडे होगये, ओर उस ढ्ग से साईकिल चलाये तो सभी दोस्त हंसे,गद्दी पर बेठे तो पेर नही पहुचते पेडलो तक,
मोती बाग मे उस समय एक मर्किट होती थी शयाद बेगम जादी नाम था या कुछ ओर, वहां पर एक साईकिल वाला था, जिस के पास मिनी साईकिल मिलती थी, १०,१५ पेसे मे एक घ्ण्टा, वहा भी पहले इन्तजार करना पड्ता था, फ़िर जेब खर्ची भी इतनी नही मिलती थी, सब से अच्छा जिस की साईकिल हाथ लगी पुरी साईकिल पार्टी की दिवाली ओर साईकिल वाले का दिवाला,
एक दिन पापा ने हमे एक नई साईकिल ला कर दी, अब सभी बच्चे हमे थोडी इज्जत से देखने लगे,ओर हमे भी अपने सपने पुरे होते दिखाई दिये, एक महान सपना गद्दी पर बेठ कर साईकिल चलने का, अब गद्दी पर बेठे केसे,एक तरफ़ से बेठे तो दुसरी ओर गिर जाये, पेडल पर जब तक हे ठीक जब गद्दी पर बेठने कि कोशिश करो साईकिल हमारे साथ गिर जाये, अब दो बच्चे साईकिल पकडे, हम साईकिल पर बेठे, फ़िर वो थोडी दुर तक धक्का मारे, तब कही हमारी सवारी चलती थी, अब कोई आगे आ गया तो मुसिबत,एक लम्बा चक्कर मारने के बाद उतारे केसे, फ़िर वही दो बच्चे साईकिल के साथ दोडे, फ़िर साईकिल को थामे, ओर हम उतारे, फ़िर दुसरे का नम्बर,तिसरे, चोथे... कितनी बार घुटने पर चोट आई ,कुहनी पर ,पता नही कितनी बार नाले मे गिरे, पाजामा,कमीज, पेंट ओर निक्कर फ़टी, लेकिन हम ने हार नही मानी.
एक बार बच्चो ने हमे साईकिल पर बिठा कर धक्का मार हमारी साईकिल चला दी, हम पुलिया पार कर के मेन सडक से होते हुये मर्किट की तरफ़ चले,मर्किट का ऎक लम्बा चक्कर लगा कर वापिस आ रहे थे तो एक कुता पता नही कहा से एक दम हमारी साईकिल के सामने से दोडा, कुते को बचाने के चककर मे हम साईकिल का थोडा वेलेंस खो बेठे,अब जल्दी जल्दी हेण्डल इधर उधर घुमाने के बाद फ़िर से अपने ध्यान मे आये तो सामने से दो लड्किया आती दिखाई दी,फ़ासला कम था हम चिल्लये बचो बचो, इस के साथ जिधर हम मुडे एक लडकी भी उधर ही मुडी, फ़िर कया था, लड्की कि दोनो तांगो के बीच मे हमारे साईकिल का पहिया, पत नही कितनी दुर तक हम साईकिल लड्की समेत चलाते गये, कयो कि सुझ हमे भी कुछ नही रहा था, फ़िर लड्की साईकिल, ओर हम कोन किस के उपर पता नही,लड्की हमे गाली निकलती हुई उठी, हमे उठाया,हम ने जल्दी जल्दी उस की किताबे उठा कर उस के सामने सिर झुका कर खडे हो गये,दोनो लड्कियो ने जितनी गलिया उन्हे आती थी हमे दी,ओर हम ने ली,कयो कि ऎसी गालिया हमे खाने की आदत सी हो गई थी, कभी बहिन से कभी मां से, अब जो लड्की गिरी थी, चोट के कारण उस से चला नही जा रहा था,लेकिन मेरी समझ मे तो कुछ नही आ रहा था,तभी एक लड्की बोली अब हमारी शकल कया देख रहा हे खडा खडा भाग जहा से,लेकिन हमारी साईकिल भी खारब हो चुकी थी
हा एक बात साईकिल बाले मिस्त्री से ज्यादा हमारे हाथ पेर ओर कपडे काले होते थे
समाप्त नही अभी ओर भी यादे हे बच्च्पन की...

4 comments:

mamta said...

बाद मे साइकिल चलानी ठीक से आई या नही । :)

जोशिम said...

राज जी - उस साल मैं पैदा हुआ था - वैसे सायकल चलने के उस अंदाज़ को "कैंची" कहते थे - जब मैंने सीखा [ आपसे करीब बारह साल बाद ] - और दिल्ली में दोस्त थोड़ा मुश्किल से ही बनते थे आपके दस साल बाद भी - मनीष

राज भाटिय़ा said...

आप का धन्यवाद टिपण्णी देने का

राज भाटिय़ा said...

ओर हा ममता जी फ़िर तो पता नही कब साईकिल आ गई चलानी , अरे अब तो मेरे बच्चो को भी आ गई,