25/03/08

चिंतन सहानुभुति

आज का विचार,हम रोज कितने ही लोगो से मिलते हे,कई बार हम एक दुसरे की मदद भी करते हे,काम से पेसे से, लेकिन कई बार इन सब से बढ कर भी एक मदद होती हे,जिस की कोई कीमत नही होती लेकिन....
सहानुभुति
दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने भिखु भिखारी खडा भीख मांग रहा था, बुढापे ने कमजोर कर दिया था, खडा होना भी मुश्किल था, लेकिन पेट की खात्तिर इतनी सर्दी मे खडा था,शायद बीमार था,जो हाथ लोगो के सामने फ़ेला रहा था वो हाथ बुरी तरह से कंप रहा था,ओर तन पर भी एक चिथाडा सी कमीज ही थी, ओर लोग भी नफ़रत से, उपेक्षिता से उसे देखते थे, जेसे कोई कीडा हो, कोई कोई उस की तरफ़ पेसा भी फ़ेक देता, कोई उसे सबक देता गाली के रुप मे,तभी एक सेठ वहां से गुजरा ओर भिखु को देख कर ठिठका,फ़िर भिखु के पास जा कर उसने भिखु के दोनो हाथ अपने हाथो मे ले कर कहा बाबा आज मेरे पास पेसे नही हे, नही तो मे जरुर देता, सेठ ने देखा भिखु रोने लगा, तो सेठ ने कहा बाबा आप रोये मत मे अभी घर जा कर नोकर के हाथ आप को कुछ पेसे ओर कुछ गर्म कपडे भेज देता हू,
भिखारी ने कहा नही सॆठ जी मे रो इस लिये रहा हु कि आप ने जिस सहानुभुति से मेरा हाथ पकड, मुझे एक इंसान समझा,वर्ना लोग तो मुझे नफ़रत ओर उपेक्षा से देख कर मेरे पास से निकल जाते हे,आप के इस प्यार ने मेरी आंखो मे आसु ला दिये, मुझे भी एह्सास करवा दिया मे भी एक इंसान हु.

4 comments:

Vikas said...

राज जी, अपने सही लिखा है, सहानुभूति से बड़ा मरहम कोई नही होता. ये मई अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ. समय मिले तो ये पोस्ट देखिएगा- http://chalte-chalte-vikas.blogspot.com/2008/03/blog-post_4777.html#links

अबरार अहमद said...

raj ji, aapki bat durust hai. sahanbhuti ki jarurat hum sabko hai kyunki hamne ise kho diya hai.

मीनाक्षी said...

राज जी, चिंतन को बाध्य करता लेख पढ़ा तो अपनी बात कहना चाहती हूँ कि सेठ ने भिखारी को सहानुभूति (sympathy) दिखाई लेकिन विकास जी ने संवेदना से नाता जोड़कर बच्चों से समानुभूति (empathy) दिखाई.
@अबरार जी, हमे एक दूसरे से सहानुभूति नही समानुभूति चाहिए.

DR.ANURAG ARYA said...

ishvar aapki is soch ko banaye rakhe ...taki aane vali peediya ise samajhe...