29/03/08

वो चांदनी रात ओर मेरी यादे १

बात बहुत पुरानी हे, सन तो याद नही, लेकिन लगता हे उस समय मेरी उम्र १४,१५ साल के आसपास होगी, हम लोग दिल्ली मे रहते थे,एक दिन गांव से पत्र आया तो घर वालो ने मजवुरी के कारण मुझे गांव भेजा, हमारा गांव पंजाब मे नवांशहर ओर गढ्शंकर के बीच मे हे, ओर हमारी मोसी का गांव हमारे गांव से ८,१० किमी दुर हे, मोसी के गाव से हमारे गांव तक आने के लिये नदी के किनारे किनारे आना पडता हे, ओर मोसी के गांव मे उन दिनो पक्की सडक आती थी, ओर मेरा प्रोग्राम पहले मोसी के गांव आना था दुसरे दिन अपने गांव जाना था, मोसी के गांव जाने के लिये हमे नवांशहर आना पडता हे, तो अब सुनिये हमारी वो यात्रा...

मे नवांशहर दोपहर को १, १,३० बजे पहुच गया, पुछने पर पता चला बस शाम को ४,३० पर जाये गी, मोसा जी ने अपने पडोसी का पता दिया था, ओर उन्हे भी मेरे आने का बता दिया था, फ़िर किसी से पुछ कर मे उन ( पडोसी) के घर पहुचा, उन्होने बडे प्यार से मेरा स्वागत किया, ओर खाने को पंजाबी खाना, ओर लस्सी भी दी, खाते ओर बात करते करते ३,३० हो गये, मे चारपाई पर थो॑डी देर के लिये लेट तो मेरी आंख लग गई, ओर उन्हे भी मुझे जगाने (ऊठाने ) का ध्यान नही रहा, शाम को ७,०० बजे मेरी आंख खुली, लेकिन बस भी गांव हो कर कब की वापिस आ चुकी थी, अगली बस दुसरे दिन जानी थी,घर बालो ने बहुत जोर दिया भई कल चले जाना, फ़िर बोले तुम्हारे ताया जी( अंकल) रात को वापिस आये गे तो तुम्हे छोड आयेगे, लेकिन मेरी जिद मे अभी जाउगा, लेकिन मेने उन का कहा मान कर रात ९,०० बजे तक ताया जी का इन्तजार किया उस दिन वो किसी काम से चण्डीगढ गये थे, जब वो ९,०० बजे तक नही आये तो मेने जाने की तेयारी करली, उन लोगो ने मुझे बहुत रोका,लेकिन मेरी जिद के आगे वो भी हार गये,कोई भी बडा लडका उन के घर नही था जिसे मेरे साथ भेज पाते, हा उन्होने अपनी साईकिल मुझे दे दी,ओर बहुत सा आशिर्वाद दे कर मुझे बुझे मन से जाने दिया.

जब तक तो रोशनी थी मे मजे से चलता रहा, फ़िर आगे अन्धेरा रास्ता आया लेकिन चांदनी रात मे फ़िर भी काफ़ी कुछ दिखाई दे रहा था,सो मे अपनी मस्ती मे चलता गया, अभी २,३ कि मी ही गया था कि साईकिल मे पंचर होगया, अब कया करु, साईकिल से उतर कर साईकिल को ले कर चल पडा, थोडी दुर जाने पर एक पुराना ईटो का भट्ठा आया, लेकिन उस भट्ठे से थोडा पहले वो बाते याद आई जो हम दिन मे करते थे,(जब भी वहा से गुजरते तो सभी कहते यहा भुत, प्रेत रहते मेने कभी भी नही सोचा था मे अकेला भी रात को यहां आउगा,सो इस लिये मे सब से ज्यादा सब को डराता था) वेसे तो मे इन बातो को नही मानाता लेकिन फ़िर भी जेसे जेसे वो भट्ठा मेरे पास आता जाता मुझे थोडा थोडा डर लगने लगा,फ़िर मे भट्ठे के पास पहुच गया, सांस रोके थोडा उस जगह से आगे निकल आया,तभी मेने महसुस किया मेरी साईकिल को कोई पीछे खीचं रहा हे, मेने थोडा ओर जोर लगाया ओर थोडा आगे आ गया, मे वेसे तो भुत प्रेत नही मानता लेकिन अब मेरी साईकिल खीचने पर भी नही आगे बड रही थी, मेने सुना था कभी भी ऎसे मोको पर पीछे मुड कर नही देखते नही तो भुत चिपक जाता हे, फ़िर साईकिल सडक के बीच गिर गई,ओर मुझ मे हिम्मत भी नही थी कि साईकिल को ऊठा लु,ओर पसीने से लथपथ, करु तो कया करु, मे साइकिल को बीच सडक पर छोड कर मोसी के गांव की तरफ़ भागा,लेकिन अब मुझ से भागा भी ना जाये, बुरा हाल था मेरा,थोडा आगे निकल आया तो थोडी हिम्मत बडी,जेसे भुत से छुटकारा मिल गया, लेकिन मेने मह्सुस किया मेरे साथ साथ कोई ओर भी भाग रहा हे,जिस के पांव की आवाज आ रही थी,ओर दिल कर रहा था कोई अपना मिल जाये जिस के गले लग कर खुब रोऊ.गांव तो अभी काफ़ी दुर था, उस चांदनी रात मे सफ़ेद सडक पर पता नही कब तक भागा, जब पेरो ने भागने से जबाब दे दिया तो भगवान का नाम जपने लगा,तभी मुझे सडक से थोडी दुर कुछ रोशानी नजर आई,ओर मेरी जान मे जान आई,ओर मे उस ओर चल पडा.

बाकी कल.

4 comments:

सागर नाहर said...

हमने तो बड़ी कोशिश की कि कोई भूत दिख जाये. एकाद बार जान बूझ कर बड़ी नदी की तरफ गये रात बारह एक बजे; जहां शमशान है, पर सुना है एक भूत को दूसरा भूत नहीं दिखा करता!
अगली कड़ी का इंतजार है।

:)

Udan Tashtari said...

जारी रखिये..बहुत रोचक संस्मरण है.

mehek said...

bahut romanchak anubhav raha bahut khub

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का धन्यवाद,सागर जी मेने भी काफ़ी भुत ओर भुतनिया ढुढी लेकिन कही नही मिली