16/03/08

चिंतन स्वामी भक्ति (वफ़ादारी )

आज हम एक ऎसे समय मे जी रहे हे,जहा स्बार्थ ही स्वार्थ हे,बेटा बाप को भी धोखा दे रहा हे,दर दर की ठोकरे खिला रहा हे उस मां बाप कॊ जिस ने उसे इतना बडा किया, उस देश से धोखे करता हे, जिस देश की जमीन मे पल कर बडा हुया, लेकिन फ़िर भी कही अच्छाई भी हे, आज का चिंतन कु्छ ऎसा ही हे, काश हम सिखते कुछ इन बातो से... तो लिजिये आप आज के विचारो का मन्थन यानि आज का चिंतन पढिये...
स्वामी भक्ति
चितॊड्गड का नाम जब तक रहे गा तब तक लोग पन्नधाया का नाम भी नही भुलेगे,जिन्होने स्वामी भक्ति ओर देश प्रेम मे अपना सब कुछ नोछाबर कर दिया,बात पुरानी हे, जब भावी राजा उदयसिहं अभी बच्चे ही थे, उन दिनो किले मे बहुत ही गलत हो रहा था,राज्य के लालच मे उदय सिंह के पिता के चचेरे भाई ने ,अपने तऊ यानि उदय सिंह के पिता की हत्या कर दी, ओर किसी मोके कि तलास मे था ता कि उदय सिंह को भी मार कर, चितॊडगड का राजा खुद बन जाउ,लेकिन चितॊडगड की रानी कॊ पता था मेरे पति के बाद अब वनबीर मेरे बेटे कॊ भी खतम करे गा,रानी ने अपनी खास नोकरानी ओर उदय सिंह की धाया मां को बुला कर सारी बाते बताई, ओर मदद की गुहार की,ओर धाया पन्ना, उदयसिंह को अपने साथ, अपनी झोपडी मे ले गई,ताकि मोका मिलते ही उदयसिंह कॊ महल से दुर चितॊडगड से दुर कुम्भल्गढ पहुचादे,
कुम्भल्गढ मे उदय सिंह मे मामा थे,अब धाया पनना के यहां धाया का बेटा जॊ उदय सिंह जितना ही बडा था,जिस का नाम चंन्दन था,दोनो आपिस मे खुब खलेअते थे,ओर उदय सिंह रात कॊ वही सो जाता था, अब बनवीर ने उदयसिंह कॊ महल मे नही देखा तो अपने गुप्तचरो से पता लगवाया,ओर जो बात गुप्तचरो ने बताई, तो बनवीर ने उसी रात उदय सिंह की हत्या की तेयारी शुरु कर दी, धाया मा को भी उन के गुप्तचर ने बनवीर की योजाना से आबगत करबाया,धाया मा को कुछ समझ नही आ रहा था,
रात होते ही,धाया मा ने अपने इरादे मजबुत कर लिये,जब चंन्दन ओर उदय सिंह सो गये तो धाया मा ने चंन्दन को उदय सिंह के बिस्तर पर लिटा दिया, ओर उदय सिह को चंन्दन के बिस्तर पर लिटा दिया,आधी रात कॊ नशे मे धुत बनवीर झोपडी के बाहिर आया ओर दरवाजा खटखटाया, ओर इन्त्जार किये बिना हि दोबारा से दरवाजे कॊ जोर से ठोकर मार कर तोड दिया ओर अन्दर जा धाया से बोला कहा हे उदय सिंह, धाया ने बनवीर के हाथ मे नंगी तलबार देख कर, बोली कयो, बनवीर बोला आज उसे खतम करुगा,धाया मा ने कमर से कटर निकाल कर चंन्दन के पास आकर जेसे उस का बचाव कर रही हो, बनवीर पर हमला कर दिया बोली मे भी दासी हु लेकिन हु मे भी राजपुतानि, तभी बनवीर ने धाया को जोर से धक्क दिया ओर सोये हुये चंन्दन को राज कुमार उदय समझ कर कई बार तलवार के कर दिये,ओर हसतां हुया वहा से चला गया.अब धाया मा ने जलदी से उदय सिंह को जुटे पतलो मे छिपा कर महल से बाहिर सुरक्षित हाथो मे सोप दिया, ओर वपिस अपनी झोपडी मे आ कर अपने बेटे के पास आ कर बेठ गई.

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप का,आज का चिन्तन। हमारा रिफ्रेशर कोर्स है।

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी धन्यवाद.