04/03/08

चिंतन

चिंतन

आज मेरा पहला लेख हे चिंतन पर, आप लोगो ने इसे किसी ना किसी रुप मे इसे जरुर सुना होगा,लेकिन अच्छी बाते बार बार सुन कर भी बुरी नही लगती,बल्कि बार बार सुन कर हमे अपने अन्दर की बुराईयो को देखने का मोका मिलता हे, हम सभी अच्छी सलाह ,अच्छे उपदेश तो बहुत देते हे लेकिन इन बातो का लाभ तभी होता हे जब हम भी....

एक बुढिया अपने पोते को ले कर एक साधु बाबा के पास जाती हे,ओर बाबा से बोलती हे,बाबा मेरा पोता गुड बहुत खाता हे, इसे बहुत समझाया, पिटाई भी की,ओर सजा भी बहुत दी लेकिन यह गुड खाने से नही हटता, फ़िर बरसात के मोसम मे इसे फ़ोडे फ़िन्सीयां भी बहुत निकल आती हे, लेकिन यह बिलकुल नही मानता, अब थक हार कर आप के पास आई हु अब आप ही कोई उपाय बताये,
बाबा ने सारी बात ध्यान से सुनी ओर बोले माता आप एक महीने बाद आना, बुढिया बोली,
बाबा मे कमजोर ओर गरीब बुढिया हु, १० किमी पेदल चल कर आई हु, फ़िर इतनी दुर केसे आउगी, आप आज ही कोई दवा दे दे,बाबा बोले नही माता इस की दवा एक महीने वाद ही मिले गी .
किसी तरह से एक महीना बीत गया, आज फ़िर बुढिया मां, पोते के साथ बाबा के पास १० किमी चल कर गई, जुन का महीना था. लेकिन पोते के प्यार ने हिम्मत दी, लू ओर गर्मी की परवाह किये वगेर दोपहर को बाबा के पास पहुच गई, बाबा ने दुर से ही देख कर बुढिया मां को पास बुला लिया, पानी बगेरा पिलाया, बुढिया मां ने फ़िर से पोते का रोग बताया, तो बाबा ने बच्चे को पास बुला कर कहा बेटा गुड नही खाते उस से बहुत नुक्सान होता हे, तुम मुझे वचन दो आज के बाद कभी गुड नही खाओ गे,बच्चे ने बाबा को वचन दिया, ओर अपनी दादी के पास चला गया.
अब बुढिया मां को थोडा गुस्सा आया, ओर बाबा से बोली, बाबा से बोली कया इतनी सी बात के लिये आप ने मुझे इस उमर मे इतना कष्ट दिया ? यही बात कहनी थी तो उसी दिन कह देते. बात सुन कर बाबा उठ कर बुढिया मां के पास आ कर बोले, मां एक महीना पहले मे भी बहुत गुड खाता था, ओर जो काम मे करता था उसे दुसरो को करने से केसे रोकता, पहले मेने अपना गुड खाना बन्द किया, अब मुझे दुसरो को मना करने का हक हे, उस दिन के बाद बुढिया मां के पोते ने भी गुड खाना बन्द कर दिया.
इस का शीर्श आप बातये

4 comments:

भोजवानी said...

पराया देश में चिंतन...कबीर सारा-रा-रा-रा-रा-रारारारारारारारार...जोगी जी सारा-रा-रा-रा-रा-रारारारारारारार

Dr.Parveen Chopra said...

हमारी द्वारा कही बात तभी किसी के मन में उतरती है जब हमारी कथनी और करनी में एकरसता आ जाती है। मैं तो समझता हूं कि हमें उस परमपिता परमात्मा से इस गुण की प्रार्थना करते रहना चाहिए।

परमजीत बाली said...

बहुत शिक्षादायक प्रसंग है।सच है जो काम आप खुद करते हैं उसे दूसरों को छोड़नें की सलाहकैसे दे सकते हैं।डा परवीन जी की बात भी विचारनें योग्य है।

राज भाटिय़ा said...

आप सभी क बहुत बहुत धन्यवाद