28/02/08

खाटारे ओर कमरक

आज बेठे बॆठे बस यु ही कुछ यादे आ गई, सन १९६० से १९६५ तक हम लोग आगरा मे थे,उन दिनो मे बहुत छोटा था,शायद पहली या दुसरी कक्षा मे था,हम लोग ताजगंज मे रहते थे, ताज के बिल्कुल सामने,हमारा स्कुल एक टीले पर हुया करता था,स्कुल से घर तक पता नही कितनी गलिया ओर सडके पार कर के घर पहुचते थे,एक हमारे गुरु जी थे,उन के घर हम पढ्ने जाते थे,ओर तखती पर खाडियां से लिखते थे,कई बार मुर्गा भी बनते थे,हमे वहां बहुत अच्छा लगता था, ओर हा हमारा एक बिषय था, सुत कातना, एक छोटी सी तकली ( पता नही सही नाम हे या गलत )जो हमे खादी की दुकान से ५ पेसे मे मिलती थी,आम ३० पेसे (पाचं आने )के १किलो मिलते थे, हम लोग पंजाबी थे शायाद इस लिये हमे मकान मुस्किल से मिलता था,कारण हमारा प्याज खाना, गोश्त खाना. जिस मकान मे हम रहते थे उस मे ओर भी बहुत से किरायेदार थे,एक बुजुर्ग ओरत थी, जिसे सब माता जी कहते थे, रोजाना शाम को माता जी सब बच्चो को बुला कर आरती करती थी,हमे कभी घ्ण्टी कभी (वो जो दो छोटे छोटे गोल से पितल के होते हे ओर दोनो हाथो से बजते हे ) शायद छेने या मर्कनद कह्ते हे बजते थे,
फ़िर हम चोथी या पाचंवी मे आये तो थोडे पर निकल आये,गर्मियो कि छुट्टियो मे जब सब सो जाते तो हम १०, १२ बच्चो की हम उमर टोली जिस मे लड्के ओर लड्किया सब थे,घर बालो कि आखं बचा कर घर से काफ़ी दुर ताज महल आ जाते ( उन दिनो ताज मे टिकट नही थी फ़िर हमे ताज के चोर दरवाजे का भी पता था ) ओर यहां भी माली की आखं बचा कर खाटरे (कच्ची ईमली) ओर कमरक तोडते थे,ओर खाटारे खाने का मजा (एक आखं दबा कर) ओर कमरक का मजा बहुत आता था, जो आज तक याद हे, फ़िर आखे दुखनी शुरु हो जाती थी, कभी कभी माली के हाथ भि लगाजाते थे,शायाद माली जानबुझ कर छोड देता था, या हम अपनी बाल्पन की चालाकी से बच जाते थे,
तीन साल पहले जब दोबारा आगरा जाना हुआ, तो बहुत खुशी हुई, समय कम था इस लिये उन जगहो पर नही जा पाया, जहा का वर्णनन उपर किया हे,लेकिन उस मकान कॊ बाहिर से देख कर आया,अगली बार ३,४ दिनो के लिये गया तो सब यादे ताजा कर के आउगा.

2 comments:

Pratik said...

बढ़िया संस्मरण है। फिर कभी आगरा आना हो तो बतलाइएगा। मुलाक़ात होगी।

राज भाटिय़ा said...

प्रतीक जी धन्यवाद टिपण्णी देने का, जब भी कभी आगरा आया जरुर मिलुगा आप से.