30/10/10
वफ़ादार
डब्बू ने बाहर की दुनिया कभी देखी ही नही थी, जब एक महीने का था तभी से वो इस घर मे ही रहा, ओर जब अमर नाथ जी ने उसे घर से बाहर फ़ेंका तो उसे कुछ समझ नही आया, लेकिन वो घर के बाहर ही बेठा रहता, जब भी कोई घर का सदस्या बाहर आता तो दिवानो की तरह खुश होता, कभी कभी प्यार भी मिलता , लेकिन दुतकार ज्यादा, बाहर के आवारा कुतो ने भी हमला किया, डब्बू को इन दो महीनो मे ही पता चल गय कि घर के बिना रहना कितना कठिन हे.
लेकिन डब्बू ने अपना घर नही छोडा घर वालो ने चाहे उसे छोड दिया, आज अमर नाथ जी सुबह सड भुन कर गये थे इस डब्बू की वजह से, ओर उन्होने आज निश्चय किया था कि आज हमेशा के लिये इस से पीछा छुडा लेगे, आज जब वो घर आने वाले थे तो ड्राईवर को खुद ही छुट्टी दे दी की जाओ, फ़िर खुद ही कार ड्राईव कर के खुद ही वो कल्ब गये, वहां दोस्तो के संग बेठे ओर रात १० बजे घर की तरफ़ चल पढे, कोठी पर पहुच कर कार को बाहर ही पार्क किया, आज डब्बू भी सुबह से डरा था, इस लिये वो भी नजदीक नही आया, जब अमर नाथ जी कार से बाहर निकले ओर कार को लांक करने लगे तो तभी दो अजनवी लोग उन के नजदीक आये ओर चाकू दिखा कर धमकाया ओर बोले की चलो हमारे साथ वर्ना जान से हाथ धॊ बेठो गे, ओर शोर नही मचाना.
अमरनाथ जी अभी दो कदम ही चले होंगे कि तभी डब्बू ने पीछे से उन बदमाशो पर हमला कर दिया, सब से पहले चाकू वाले को पकडा ओर इस अचानक हमले से उस का चाकू कही गिर गया, ओर उस के साथी ने अपनी पिस्तोल निकलनी चलानी चाही लेकिन उस से पहले ही डब्बू ने उसे भी दबोच लिया, चाकू वाला कार की तरफ़ भागा तो डब्बू ने उसे भी घेर लिया, अब दोनो बदमाश इस हमले से अपने अपने हथियार वही छोड कर सर पर पांव रख कर भागे, ओर डब्बू उन्हे दुर तक छॊड कर आया,फ़िर डब्बू अमर नाथ जी के पास आ कर उन के पांव चाटने लगा.
अमर नाथ जी ने डब्बू को प्यार से अपने पास बुलाया ओर उसे गले लगा कर जोर जोर से रोने लगे वही जमीन पर पडे पडे, इतना शोर सुन कर घर वाले भी बाहर आये तो देख की अमर नाथ जी सडक पर गिरे हे ओर डब्बू से प्यार कर रहे हे, ओर डब्बू भी चूं चूं कर के जेसे शिकायत कर रहा हो, तो अमर नाथ जी ने सब को डब्बू के बारे बतलाया कि किस प्रकार इन वेजुबान ने अपनी जान पर खेल कर उन्हे बचाया .
31/07/10
क्या यह सच कह रहे है हमारे बीरवल जी? पढिये इसे जरुर लेकिन समय निकाल के....
इस दुनिया में सबसे अधिक मूर्ख किस देश में रहते हैं.”
इस कहानी को पढने के लिये आप का धन्यवाद
24/10/08
भगवान विष्णु जी ओर माता लक्ष्मी जी की एक कहानी.
आज की यह कथा दिपावली पर है ओर आशा करता हुं , आप इस से कुछ ना कुछ जरुर प्राप्त करेगे, ओर इस कथा के साथ साथ मै आप सब को दिपावली की बधाई देता हुं, भगवान से आप सब के लिये शुभकामनाये चाहता हूं आप सब को दिपावली हंसी खुशी आये, ओर दीपो के समान आप सब के जीवन मै से अंधेरा मिटा कर रोशनी करे, आप सब खुश रहै। शुभ दिपावली.
भगवान विष्णु जी ओर माता लक्ष्मी जी की एक कहानी।आगे पढ्ने के लिये यहां दबाये
18/10/08
ताऊ की चालाकी
एक समय की बात है, जब ताऊ जवान हुआ करता था,ताऊ घर पर सोया था, ओर उधर नहर वाले खेत के पास से तीन अजनबी लोग गुजर रहे थे, दोपहर का समय था, ओर आसपास भी कोई नही था,अब तीनो ने सोचा चलो खेत मे चने लगे हे, ओर आसपास भी कॊई नही, ओर हमे भूख भी लगी हे, तो चने खाये जाये, यह तीनो लोग मे से एक ब्राह्मण था, एक क्षत्रिय था, ओर एक नाई, बहुत सोच समझ के बाद तीनो ने चने उखाडे ओर वही बेठ के खाने लगे.पुरी कहानी पढने के लिये यहां दवाये
29/09/08
एक लघु कथा
यह तो आप सब को मालुम हे की पांडव पांच भाई थे,सब से बडा युधिष्ठिर, फ़िर भीम, अर्जुन ,नकुल ओर सब से छोटा सहदेव, एक दिन यह सभी भाई हाथ से बनी कपडे की गेंद से खेल रहे थे, ओर खेल मे सभी को बहुत मजा आ रहा था, कि अचानक गेंद सहदेव के हाथ से कुयें मे गिर गई, ओर खेल मे रुकावट आ गई, पांचो भाई अभी बच्चे थी, खेल रुक जाने से बहुत दुखी हुये,
ओर सोचने लगे की कुंये से गेंद केसे बाहर निकाले ? गेंद दिख तो रही थी, लेकिन पानी बहुत नीचे होने के कारण, कोई भी उपाये काम नही कर रहा था, फ़िर पांचो भाई थक हार कर उसी कुयें की मुंडेर पर चुपचाप बेठ गये, सभी चुप चाप एक उदासी सी सब पर छाई हुयी थी।
तभी वहां से एक ब्राहमण गुजरा ओर उसने देखा सभी बच्चे चुप चाप बेठे हे ओर काफ़ी उदास भी हे, उसे यह सब आजीब लगा, ओर फ़िक्र भी हुयी, उस ने सभी बच्चो से इस चुपी का कारण पुछा तो, बडे भाई युधिष्ठिर ने जबाब दिया, हम पांचो भाई हे, ओर यहां गेंद से खेल रहे थे,कि अचानक हमारी गेंद इस कुंय़े मे गिर गई,ओर हम उसे निकाल नही पा रहे,
उस ब्राहमण ने कहा बच्चो उदास नही होते आ मे निकाल दु तुम्हारी गेंद, ओर उस ब्राहम ने यह कह कर धनुष पर तीर चढाया ओर गेंद पर निशाना लगा कर तीर छोडा फ़िर दुसरा तीर पहले तीर के उपर छोडा इस तरह से कई तीर छोडने के बाद सब से उपर वाले तीर को पकड कर गेंद कॊ कुयें से बाहर निकाल लिया, ओर पांचो भाई बहुत खुश हुये ब्राहमण को प्राणाम करके उन का धन्यवाद किया।
शाम को जब यह बात अपने ताऊ धृतराष्ट्र को बताई , तो धृतराष्ट्र ने उस ब्राहमण् को अपने बेटो ओर भतीजो को धनुष विध्द्या सिखाने का काम इन्हे सोंप दिया।
पहचाना यही थे गुरु द्रोणाचार्य
23/08/08
बहादुर बच्चा
सर्दियो के दिन से, एक बालक अपने गांव से अकेले ही स्कुल जा रहा था, उस के रास्ते रेल की पटरिया भी आती थी, ओर वह हमेशा की तरह से आज भी उन पटरियो प्र मस्ती से चला जा रहा था, कि उस ने देखा एक जगह पर पटरी उखडी पडी हे,ओर बालक को पता था,कि रोजाना आने वाली गाडी थोडी ही देर मे आने वाली हे.
ओर अगर वह गाडी यहां से गुजरी तो एक बहुत ही भंयकर दुर्घटना घट सकती हे, उस बालक ने बहुत सोचा की मे केसे रोकू इस रेल को, स्टेशन भी दुर हे, तभी उसे दुर से गाडी आती दिखाई दी, ओर बालक ने झट से आपनी कमीज उतार कर उसे हवा मे लहराने लगा, ओर जोर जोर से चिल्लाने लगा साथ साथ मे गाडी की तरफ़ दोनो पटरियो के बीच मे भगने लगा, उस बालक को पता था कि इस तरह से अगर गाडी ना रुकी तो उस क मरना निश्चित हे, लेकिन वह बालक चाहता था, उन हजारो यात्रियो को बचाना, जिन मे बच्चे , बुढे, ओरते थी,
अब गाडी काफ़ी धीरे धीरे चलने लगी थी, शायद रेल के चालक ने बच्चे को देख लिया था, फ़िर रेल रुक गई ओर उस के चालक ने बच्चे से गुस्से मे कहा यह कोई खेलने की जगह नही, लेकिन जब बच्चे ने उस चालक को पुरी बात बताई ओर वह जगह दिखाई तो , चालक समेत सभी यात्रियो ने बच्चे का बहुत बहुत धन्यवाद किया.
यह घटना एक सच्ची घटना हे, ओर गाजी पुर स्टेश्न के पास की हे,ओर इस बच्चे का नाम अक्षय हे, ओर यह बात १९५६ सन की हे, उस समय हमारे राष्ट्र्पति राजेन्द्र प्रसाद जी थे, ओर उन्होने अपने हाथो से इस बहादुर बच्चे को अशोक चक्र दे कर सम्मानित किया था.
काश हम सब इस बालक की तरह से दुसरो का सोचे , तो हमारे देश मे नफ़रत बचेगी ही नही,अभी तो हम सब को अपनी अपनी ही नही ,अपने आने वाली दस पीढीयो तक की फ़िक्र हे,बाकी जाये भाड मे, हम कितने खुदगर्ज बन गये हे ?
22/08/08
उपकार का बदला
विश्र्वनाथ जी सीरी पुर गांव मे रहते थे, वह अध्यापक थे, ओर इस काम को पुजा की तरह से मानते थे,बच्चो को अच्छी तरह से पढाना, अनुशासन सिखाना, ओर अच्छे संस्कार बच्चो मे डालना, इस कारण विधार्थी ओर उन के मां बाप भी विश्र्वनाथ जी का पुरा आदर ओर सम्मान करते थे,
विश्र्वनाथ जी की पत्नि लक्षमी भी बहुत ही सुशील सयानी थी, हर विषय मे अपने पति का साथ देती थी, ओर बच्चो को भी कई बाते समझाती थी, इन का एक ही बेटा था, जिस का नाम चॆतन्य था, जिसे दोनो ने बडे लाडप्यार से पाला, ओर अच्छे संस्कार भी दिये.
अब गाव की पढाई समापत करके चॆतन्य, शहर मे गया ओर वहा उच्च शिक्षा प्राप्त की ओर फ़िर वही पर अपने लिये एक अच्छी नोकरी भी ढूढं ली, ओर शहर मे ही रहने लगा. एक दिन माता पिता को पता चला की उन के इकलोते बेटे ने शहर मे शादी भी कर ली हे,
यह जान कर विश्र्वनाथ जी को बहुत ही धक्का लगा, ओर अपनी बीबी से बोले अगर हमारा बेटा हमे बता कर शादी करता तो हम मना थोडे ही करते,बल्कि हमे बहुत खुशी होती, किसे नही होती अपने बेटे की शादी की, चलो अब हमे हमारा बेटा अजनबी समझता हे, हम पराये हो गये हे, ओर विश्र्वनाथ जी की आंखो मे आंसु आ गये, तो लक्षमी ने भरी आवाज मे कहा अब क्या कर सकते हे, चलो जो हुआ उसे भुल जाओ.
एक बार गरमियो की छुट्टियो मे विश्र्वनाथ जी पत्री समेत तीर्थ यात्रा पर हरिद्वार आ़ए, ओर कुछ दिन वही रहे, एक दिन पुजा के पश्चात जब विश्र्वनाथ जी मन्दिर के बाहर बेटे भजन सुन रहे थे, तो एक ९,१० साल का बालक भीख मांगता हुआ उन के सामने आ गया ओर भीख मांगने लगा,विश्र्वनाथ जी ने उस बालक से कहा बेटा यह उम्र तो तुम्हारी पढने लिखने की हे, तुम इस उम्र मे भीख क्यो मांग रहे हो? तुम्हारे माता पिता कहा हे.
यह सब सुन कर बच्चे ने कहा, कुछ समय पहले मेरे माता पिता एक नाव दुर्घटना मे चल बसे, मे ओर मेरे बुढे दादा जी ही बच्चे, हम बहुर गरीब परिवार से हे, अब खाने को चाहिये , ओर दादा जी काम कर नही सकते इस लिये मे भीख मांग कर अपना ओर दादा जी का पेट भरता हू,
विश्र्वनाथ जी ने उस लडके को अपने पास बुलाया ओर प्यार से पुछा कया नाम बेटे तुम्हारा ?बच्चे ने अपना नाम मल्लिक बताया,विश्र्वनाथ जी ने पुछा क्या तुम पढोगे? बच्चे नए कहा जी जरुर लेकिन... विश्र्वनाथ जी ने कहा बेटा मे तुम्हे पढाऊगा, ओर तुम्हारे दादा जी भी हमारे साथ रहे गे, तो बच्चा खुश हो गया, ओर विश्र्वनाथ जी जी ने अपनी पत्री से भी सलाह मांगी ओर उस बच्चे को ओर उस के दादा जी को अपने गांव ले आये.
ओर फ़िर मल्लिक खुब मन लगा कर पढा, ओर समय भी तेजी से बढता रहा, इस बीच मल्लिक के दादा जी का देहांत हो गया ओर मल्लिक इन दस सालो मे, खुब अच्छा पढ गया ओर... एक दिन विश्र्वनाथ जी का देहान्त हो गया, मल्लिक ओर लक्षमी जि के साथ साथ पुरा गाव ही विषाद सागर मे डुब गया, चेतन्य को खबर दी गई लेकिन वह या उअस का परिवार इस समय नही आ पाये , ओर विश्र्वनाथ जी का किर्या कर्म मल्लिक ने ही किया.
दो हफ़्तो बाद जब चेतन्य गाव आया ओर उसे पता चला कि पिता जी ने सारी जायदाद मल्लिक के नाम कर दी हे, तो उसे बहुत ही क्रोध आया, ओर इस बारे जब वह अपनी मां से बात करने के लिये बिमार मां के कमरे की ओर जा रहा था तो उसे कमरे से कुछ आवाजे आई, ओर वह ध्यान से सुननए लगा.
मल्लिक कह रहा था मां जी गुरु ने मुझे शिक्षा दी हे उस शिक्षा के बल पर मे कोई भी नोकरी ढुंढ लूगां,ओर आप ने भी मुझे मां की ममता दी हे,आश्रय दिया, शिक्षा दी हे, ओर आप की हर तरह से सेवा करना मेरा कर्तव्य हे.मेरी जिमेदारी हे, ओर गुरु जी ने जो जायदाद मेरे कॊ दी हे वह मे आप के बेटे कॊ सोंप दुगां,इस के लिये मुझे आप की इज्जात चाहिये,यह सब बाते बाहर खडा चेतन्य सुन रहा था, ओर उस ने मसुस किया की मल्लिक का दिल कितना साफ़ हे.
ओर वह अन्दर आया ओर मल्लिक का हाथ पकड कर बोला तुम मेरे भाई के समान हो,तुम ने साबित कर दिया कि कोई जनम लेने मात्र से ही पुत्र नही होता, इस लिये मेरे से ज्यादा हक इस घर पर तुम्हारा हे,ओर अब यह सारी जयादाद भी तुमहारी हे, मां मेरे साथ शहर नही आना चाहती, इस लिये मां की सेवा भी तुम ने ही करनी हे
लक्षमी जब तक जीवत रही मल्लिक के साथ ही रही,ओर मल्लिक ने अपना वचन निभाया, ओर जिस पाठशाला को विश्र्वनाथ जी शुरु किया उसे मल्लिक ने आगे बढाया
09/08/08
वैतरणी नदी एक प्रेणाजनक कहानी।
जाटजी और पोपजी की कहानी
एक जाट था । उसके घर में एक गाय बहुत अच्छी और बीस सेर दूध देने वाली थी । दूध उसका बड़ा स्वादिष्ट होता था । कभी-कभी पोपजी के मुख में भी पड़ता था । उसका पुरोहित यही ध्यान कर रहा था कि जब जाट का बुड्ढ़ा बाप मरने लगेगा तब इसी गाय का संकल्प करा लूंगा । कुछ दिन में दैवयोग से उसके बाप का मरण समय आया । जीभ बन्द हो गई और खाट से भूमि पर ले लिया अर्थात् प्राण छोड़ने का समय आ पहुंचा । उस समय जाट के इष्ट-मित्र और सम्बन्धी भी उपस्थित हुए थे । तब पोपजी पुकारा कि "यजमान ! अब तू इसके हाथ से गोदान करा ।" जाट १० रुपया निकाल कर पिता के हाथ में रखकर बोला - "पढ़ो संकल्प !" पोपजी बोला - "वाह-वाह ! क्या बाप बारम्बार मरता है ? इस समय तो साक्षात् गाय को लाओ, जो दूध देती हो, बुड्ढी न हो, सब प्रकार उत्तम हो । ऐसी गौ का दान करना चाहिये ।"
जाटजी - हमारे पास तो एक ही गाय है, उसके बिना हमारे लड़के-बालों का निर्वाह न हो सकेगा इसलिए उसको न दूंगा । लो २० रुपये का संकल्प पढ़ देओ ! और इन रुपयों से दूसरी दुधार गाय ले लेना ।
पोपजी - वाहजी वाह ! तुम अपने बाप से भी गाय को अधिक समझते हो ? क्या अपने बाप को वैतरणी नदी में डुबाकर दु:ख देना चाहते हो । तुम अच्छे सुपुत्र हुए ? तब तो पोपजी की ओर सब कुटुम्बी हो गये, क्योंकि उन सबको पहिले ही पोपजी ने बहका रक्खा था और उस समय भी इशारा कर दिया । सबने मिलकर हठ से उसी गाय का दान उसी पोपजी को दिला दिया । उस समय जाट कुछ भी न बोला । उसका पिता मर गया और पोपजी बच्छा सहित गाय और दोहने की बटलोही को ले अपने घर में गाय-बच्छे को बाँध बटलोही धर पुन: जाट के घर आया और मृतक के साथ श्मशानभूमि में जाकर दाहकर्म्म कराया । वहाँ भी कुछ-कुछ पोपलीला चलाई । पश्चात् दशगात्र सपिण्डी कराने आदि में भी उसको मूंडा । महाब्राह्मणों ने भी लूटा और भुक्खड़ों ने भी बहुत सा माल पेट में भरा अर्थात् जब सब क्रिया हो चुकी तब जाट ने जिस किसी के घर से दूध मांग-मूंग निर्वाह किया । चौदहवें दिन प्रात:-काल पोपजी के घर पहुँचा । देखा तो पोपजी गाय दुह, बटलोई भर, पोपजी की उठने की तैयारी थी । इतने में ही जाटजी पहुँचे । उसको देख पोपजी बोला, आइये ! यजमान बैठिये !
जाटजी - तुम भी पुरोहित जी इधर आओ ।
पोपजी - अच्छा दूध धर आऊँ ।
जाटजी - नहीं-नहीं, दूध की बटलोई इधर लाओ ।
पोपजी बिचारे जा बैठे और बटलोई सामने धर दी ।
जाटजी - तुम बड़े झूठे हो ।
पोपजी - क्या झूठ किया ?
जाटजी - कहो, तुमने गाय किसलिए ली थी ?
पोपजी - तुम्हारे पिता के वैतरणी नदी तरने के लिए ।
जाटजी - अच्छा तो तुमने वहाँ वैतरणी के किनारे पर गाय क्यों न पहुँचाई ? हम तो तुम्हारे भरोसे पर रहे और तुम अपने घर बाँध बैठे । न जाने मेरे बाप ने वैतरणी में कितने गोते खाये होंगे ?
पोपजी - नहीं-नहीं, वहाँ इस दान के पुण्य के प्रभाव से दूसरी गाय बनकर उसको उतार दिया होगा ।
जाटजी - वैतरणी नदी यहाँ से कितनी दूर और किधर की ओर है ?
पोपजी - अनुमान से कोई तीस करोड़ कोश दूर है । क्योंकि उञ्चास कोटि योजन पृथ्वी है और दक्षिण नैऋत दिशा में वैतरणी नदी है ।
जाटजी - इतनी दूर से तुम्हारी चिट्ठी वा तार का समाचार गया हो, उसका उत्तर आया हो कि वहाँ पुण्य की गाय बन गई, अमुक के पिता को पार उतार दिया, दिखलाओ ?
पोपजी - हमारे पास 'गरुड़पुराण' के लेख के बिना डाक वा तारवर्की दूसरा कोई नहीं ।
जाटजी - इस गरुड़पुराण को हम सच्चा कैसे मानें ?
पोपजी - जैसे हम सब मानते हैं ।
जाटजी - यह पुस्तक तुम्हारे पुरषाओं ने तुम्हारी जीविका के लिए बनाया है । क्योंकि पिता को बिना अपने पुत्रों के कोई प्रिय नहीं । जब मेरा पिता मेरे पास चिट्ठी-पत्री वा तार भेजेगा तभी मैं वैतरणी नदी के किनारे गाय पहुंचा दूंगा और उनको पार उतार, पुन: गाय को घर में ले आ दूध को मैं और मेरे लड़के-बाले पिया करेंगे, लाओ ! दूध की भरी हुई बटलोही, गाय, बछड़ा लेकर जाटजी अपने घर को चला ।
पोपजी - तुम दान देकर लेते हो, तुम्हारा सत्यानाश हो जायेगा ।
जाटजी - चुप रहो ! नहीं तो तेरह दिन लों दूध के बिना जितना दु:ख हमने पाया है, सब कसर निकाल दूंगा । तब पोपजी चुप रहे और जाटजी गाय-बछड़ा ले अपने घर पहुँचे ।
जब ऐसे ही जाटजी के से पुरुष हों तो पोपलीला संसार में न चले ।
हम सब को इस जाट भाई से अकल लेनी चाहिये..
04/08/08
घोसला २
क्रम्श से आगे..
बच्चे का धक्का लगने से मेरे हाथ मे पकडा डण्डा थोडा हिला ओर सन्तलुन बिगडने के कारण जाली बिल्ली के मुंह पर लगी, ओर वो शायद डर गई, ओर डर के उस जगह से उछली, जब उछली तो छत से टकराई, ओर फ़िर सीधी १० मीटर के करीब नीचे जमीन पर गिरी, ओर गिरते ही एक बार उछली ओर फ़िर जमीन पर सीधी लेट गई, सभी नीचे भागे देख कही मर तो नही गई, लेकिन अभी उस की सांस चल रही थी, ओर आस पास कही खुन भी नही था,कोई झट से बिल्ली बाले को भी बुला लाया,वह गोरा हमारा पडोसी था,जिस से अच्छी राम राम थी, अभी उसे सारी बात बता ही रहे थे कि बिल्ली मियाउ मियाउ करके भाग गई, ओर सभी हंसने लगे, बात खत्म ,अब दे्खा तो चिडिया ओर चिडा भी मजे से बेठे हमे देख रहे थे,जेसे हमे धन्यवाद कर रहे हो,ओर कुछ ही दिनो मे चिडियां के बच्चे अपनी चोचं अपने घोसला से बाहर निकाल कर देखते थे,सारा दिन चीची लगी रहती हे, हम सोच रहे थे की हर साल की तरह से चिडिया इन्हे फ़िर से उडना सिखाये गी, ओर फ़िर यह पक्षी थोडे समय बाद उडना सीख जाते हे, ओर मां बाप के साथ रहते हे या नही पता नही फ़िर पतझड मे कही गरम देश मे चले जायेगे...
एक दिन मुझे अदलत का एक पत्र मिला, मे उसे पा कर हेरान सा हुआ, खोलने पर पता चला की मेरे पडोसी ने जीव हत्या करने की कोशिश करने पर मेरे उपर मुकदमा ठोंक दिया हे, दुसरे दिन मे अदालत मे गया, वहा से कुछ पता नही चला तो एक वकील से सलाह लेने गया, तो उस बकील ने सारी बात सुनी, ओर राय दी की तुम्हे किसी भी वकील की जरुरत नही, बस एक पत्र लिख कर या टाईप करके ओर सारी कहानी उस मे लिख कर अदालत को भेज दो, कुछ ही दिनो मे फ़ेसला आ जाये गा,वकील को मेने धन्यावाद किया घर आ कर बेटे ने एक पत्र पुरी बात समेत अदालत के नाम लिख कर भेज दिया, साथ मे यह भी लिख दिया की आप का फ़ेसला मुझे मंजुर होगा जो फ़ेसला भी आप करे गे, लेकिन मेने बिल्ली को जान बुझ कर नही गिराया. मे तो दुसरे चार जीवो को बचाने की कोशिश कर रहा था,ओर बिल्ली को भी नुकसान नही पहुचाना चाहता था,
तीन सप्ताह बाद फ़ेसला मेरे हक मे आया, ओर इस दोराना चिडिया के बच्चे भी काफ़ी बडे हो गये थे, एक दिन देखा कि चिडिया के बच्चे बाहर आंगन मे उड रहे हे, ओर साथ साथ चिडिया ओर चिडा भी शायद उन्हे सीखा रहे थे,ओर हमे डर था कही हेरी उन्हे नुकसान ना पहुचाये, लेकिन हेरी भी उन्हे देख कर, ओर सुंघ कर वापिस आ जाता था, फ़िर कुछ दिन बाद यह सब पता नही कहां उड कर चले गये,अगली बार फ़िर से आये गे, लेकिन अब मेने वहां जाने वाले रास्ते पर थोडी कीले लगा दी हे.
लेकिन इन सब बाते से मेने देखा हमारी तरह से पक्षी भी तडपते हे अपने बच्चो के लिये,ओर वो भी भावन्ये रखते हे,
03/08/08
घोंसला
आज जब मे ओफ़िस से घर आया ओर सीढीया चढने लगा तो पहली सीढी से ही पता चल गया की हर साल की तरह इस साल फ़िर से मेहमान आ गये हे, बिन बुलाये, लेकिन मुझे बहुत अच्छे लगते हे, अब तो सब को आदत सी पड गई हे,पहले पहल बच्चो को इन का शोर अच्छा नही लगता था, ओर बीबी को इन का गन्द डालना भी नही भाता था,दिन मे कई बार सफ़ाई करो, लेकिन यह वाज नही आते,ओर अब यह पुरे घर की आंखो का तारा हे, ओर तो ओर हमारे हेरी भी अब इन का पुरा ख्याल रखते हे(हेरी जो दुनिया का सब से वफ़ा दार हे), लेकिन इस बार कुछ ऎसा हुया कि..... इन मेहमानो की वजह से हम सब परेशान हो गये ओर बात अदालत तक पहुच गई,केसे तो पढिये आप भी यह कहानी .....
हमारा घर जहां मे रहता हु, दो मंजिला हे, हम ऊपर रहते हे, ओर छत काफ़ी नीचे तक हे,ताकि बाल्कोनी भी छत से ढक जाये,ओर छत को सहारा देने के लिये जोकि बालकोनी तक हे अलग से शहतीर छत के साथ साथ लगा हे,जिन सीढीयो से हम उपर घर मे आते हे इस के साथ ही एक कमरे मे हम सब ने पढने लिखने ओर कम्पुटर वगेरा रखे हे, बडे लडके का कम्पुटर खिडकी के पास हे,यही बाल्कोनी के शहतीर का एक कोना आ कर मिलता हे, जो छत से थोडा नीचे हे, आप इसे फ़ोटो मे देख सकते हे,ओर यह कहानी यही से शुरु होती हे..
हर साल सितम्बर अन्त से नबम्बर तक यहां से काफ़ी पक्षी चले जाते हे,ओर अप्रेल मई मे फ़िर से लोट कर आ जाते हे, अब हमे पता नही वही पक्षी हमारे यहां बार बार आते हे या अलग अलग जोडा, लेकिन एक ही नसल के पक्षी हर साल हमारे घर मे आ कर पुरी गर्मिया रहते हे, जब यह मई मे आते तो अपने पुराने घोंसला को वहां से हटाते हे, फ़िर आस पास सफ़ाई भी करते हे, ओर फ़िर चिडिया ओर चिडा दोनो यह काम करके नये घर की तेयारी मे लग जाते हे, अब खिडकी बिलकुल नजदीक हे, ओर यह फ़िर घोंसला बनाते समय बहुत शोर करते हे सारा दिन वीं चीं लगी रहती हे, पता नही हम इनसानो की तरह यह भी आपस मे कुछ एक दुसरे को कहते होगे, लडते होगे, लेकिन इस घोंसला बनाने मे करीब इन के १० १५ दिन लग जाते हे, ओर इस दोरान जो तिनके इन्हे नही चाहिये वो सब नीचे फ़ेकं देते हे, यानि गन्द डालते हे, पहले पहल तो बच्चो को बुरा लगता था क्यो कि आज कल यहां भी गर्मियो का मोसम हे सो खिडकीयां खुली रखते हे, ज्स के कारण इन की ची ची बहुत तंग करती थी,
चलिये अब घोंसला बन गया थोडे दिन शान्ति से कट गये, पहले पहल हम भी देखते थे, अब यह कहा चले गये, कही मर तो नही गये, अजी नही थोडे ही दिनो मे क्या देखते हे बीबी तो मजे से अपने घोंसला मे बेठी हे ओर मियां हर पल खाना ला ल कर उसे दे रहे हे, ओर बीबी मजे से बेठी ठुकर ठुकर हमे देखती शायद उस का डर खतम हो गया था, ओर हमे अपने घर का ही एक हिस्सा समझती थी, फ़िर थोडे दिनो मे सीढीयो पर टुटे हुये अण्डे दिखे, दिल बहुत उदास हुआ यह देख कर, लेकिन नही दुसरे दिन सुबह सुबह ही पुरे घर मे अब इन का शोर मच जाता छे छे ची ची की आवाजे इकाट्टी आनी शुरु हो गई, मां बाप दोनो जाये चोंच भर कर खाना लाये ओर चारो बच्चे अपनी चोंचे बाहर कर के खुब चिल्लाये, जेसे कह रहे हो हमे दो हमे दो..खुब शोर मच जाता हे दुर से ही आवाज आती हे,ओर यह बच्चे भी नही डरते थे हम से,कई बार महसुस किया की चिडिया ओर चिडा हमे देख कर ओर भी खुशी से चहकते थे,लेकिन सीढिय़ो का बुरा हाल, अब वहा बीट ही बीट, ओर तिनके ही तिनके, सब मिला कर अब हम सब को बहुत अच्छा लगता था,
एक दिन हेरी बहुत बहुत जोर जोर से भोकने लगा, सोचा इस समय कोन होगा, क्यो कि यह पोस्ट वाले को ही सब से ज्यादा भोकता हे,जब बच्चे बाहर गये तो वो भी जोर जोर से चिल्लने लगे फ़िर बीबी भी बाहर निकली तो वह भी हट हट बोल रही हे ओर चिल्ला रही हे,अजीब सा शोर मच गया, आस पडोस के भी लोग इन सब को देख कर आ गये, ओर सभी कुछ ना कुछ बोल रहे हे, अब मुझे भी आना पडा बाहर, ओर बाहर आते ही जो मेने देखा तो मेरे पांव तले से जमीन ही निकल गई, पता नही केसे हमारे पडोसी की बिल्ली बालकोनी से उस शहतीर पर चढ गई,जगह कम होने की वजह से, वो धीरे धीरे उस चिडिया के घोंसला की ओर बढ रही हे, उधर चिडिया ओर चिडा मदद के लिये ही शायद चीची करके शोर मचा रहे थे, इधर सभी बच्चे ओर हम साथ मे हेरी भी सभी का साथ दे रहा था, अगर खिडकी खोल कर भी जाऊ तो चिडिया के बच्चे बचाना मुश्किल था, इतना बडी लकडी भी नही, तभी मेरे दिमाग मे आया की छत से मकडे के जाले साफ़ करने वाले जाले से इस बिल्ली को यहां से हटाया जाये,ओर मे जल्दी से उसे ले कर आया अब बिल्ली ओर घोंसला मे मुस्किल से एक मीटर का फ़सला ही बचा था, ओर सब ने सोच लिया की अब तो सब के सब बच्चे बिल्ली के पॆट मे, ओर अब सब सांस रोके देखने लगे थे, सभी बिल्ली को कोस रहे थे, इतनी देर मे जाला ले कर आया ओर उसे लम्बा करने लगा, आज इसे भी लम्बा करने मे समय लग रहा था, अब बिल्ली बिल कुल घोंसला के पास तक पहुच चुकी थी, तभी मेने अपने जाले को बिल्ली ओर घोंसला के बीच मे कर दिया, ओर सोचा की बिल्ली को धीरे धीरे वापिस ले आऊगा, तभी एक बच्चे का धक्का मुझे लगा, ओर.....
शेष आगले भाग मे
12/07/08
फैसला
21/04/08
अमृत अन्तिम भाग
मैंने जोश में भरकर जवाब दिया—आपके क़लम की जबान से दाद पाने की कोई सूरत न थी। इस तनक़ीद के लिए मैं ऐसी-ऐसी कई मौते मर सकता था।मेरे इस बेधड़क अंदाज ने आयशा की जबान को भी शिष्टाचार और संकोच की क़ैद से आज़ाद किया, मुस्कराकर बोली—मुझे बनावट पसंद नहीं है। डाक्टरों ने कुछ बतलाया नहीं? उसकी इस मुस्कराहट ने मुझे दिल्लगी करने पर आमादा किया, बोला—अब मसीहा के सिवा इस मर्ज का इलाज और किसी के हाथ नहीं हो सकता।आयशा इशारा समझ गई, हँसकर बोली—मसीहा चौथे आसमान पर रहते हैं।मेरी हिम्मत ने अब और कदम बढ़ाये---रुहों की दुनिया से चौथा आसमान बहुत दूर नहीं है।आयशा के खिले हुए चेहरे से संजीदगी और अजनबियत का हल्का रंग उड़ गया। ताहम, मेरे इन बेधड़क इशारों को हद से बढ़ते देखकर उसे मेरी जबान पर रोक लगाने के लिए किसी क़दर खुददारी बरतनी पड़ी। जब मैं कोई घंटे-भर के बाद उस कमरे से निकला तो बजाय इसके कि वह मेरी तरफ अपनी अंग्रेजी तहज़ीब के मुताबिक हाथ बढ़ाये उसने चोरी-चोरी मेरी तरफ देखा। फैला हुआ पानी जब सिमटकर किसी जगह से निकलता है तो उसका बहाव तेज़ और ताक़त कई गुना ज्यादा हो जाती है आयशा की उन निगाहों में अस्मत की तासीर थी। उनमें दिल मुस्कराता था और जज्बा नाजता था। आह, उनमें मेरे लिए दावत का एक पुरजोर पैग़ाम भरा हुआ था। जब मैं मुस्लिम होटल में पहुँचकर इन वाक़यात पर गौर करने लगा तो मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि गो मैं ऊपर से देखने पर यहां अब तक अपरिचित था लेकिन भीतरी तौर पर शायद मैं उसके दिल के कोने तक पहुँच चुका था।४जब मैं खाना खाकर पलंग पर लेटा तो बावजूद दो दिन रात-रात-भर जागने के नींद आंखों से कोसों दूर थी। जज्बात की कशमकश में नींद कहॉँ। आयशा की सूरत, उसकी खातिरदारियॉँ और उसकी वह छिपी-छिपी निगाह दिल में एकसासों का तूफान-सा बरपा रही थी उस आखिरी निगाह ने दिल में तमन्नाओं की रुम-धूम मचा दी। वह आरजुएं जो, बहुत अरसा हुआ, मर मिटी थीं फिर जाग उठीं और आरजुओं के साथ कल्पना ने भी मुंदी हुई आंखे खोल दीं।दिल में जज्ब़ात और कैफ़ियात का एक बेचैन करनेवाला जोश महसूस हुआ। यही आरजुएं, यही बेचैनिया और यही कोशिशें कल्पना के दीपक के लिए तेल हैं। जज्बात की हरारत ने कल्पना को गरमाया। मैं क़लम लेकर बैठ गया और एक ऐसी नज़म लिखी जिसे मैं अपनी सबसे शानदार दौलत समझता हूँ।मैं एक होटल मे रह रहा था, मगर किसी-न-किसी हीले से दिन में कम-से-कम एक बार जरुर उसके दर्शन का आनंद उठाता । गो आयशा ने कभी मेरे यहॉँ तक आने की तकलीफ नहीं की तो भी मुझे यह यकीन करने के लिए शहादतों की जरुरत न थीकि वहॉँ किस क़दर सरगर्मी से मेरा इंतजार किया जाता था, मेरे क़दमो की पहचानी हुई आहटे पाते ही उसका चेहरा कैसे कमल की तरह खिल जाता था और आंखों से कामना की किरणें निकलने लगती थीं।यहां छ: महीने गुजर गये। इस जमाने को मेरी जिंदगी की बहार समझना चाहिये। मुझे वह दिन भी याद है जब मैं आरजुओं और हसरतों के ग़म से आजाद था। मगर दरिया की शांतिपूर्ण रवानी में थिरकती हुई लहरों की बहार कहां, अब अगर मुहब्बत का दर्द था तो उसका प्राणदायी मज़ा भी था। अगर आरजुओं की घुलावट थी तो उनकी उमंग भी थी। आह, मेरी यह प्यासी आंखें उस रुप के स्रोत से किसी तरह तप्त न होंती। जब मैं अपनी नशें में डूबी हुई आंखो से उसे देखता तो मुझे एक आत्मिक तरावट-सी महसूस होती। मैं उसके दीदार के नशे से बेसुध-सा हो जाता और मेरी रचना-शक्ति का तो कुछ हद-हिसाब न था। ऐसा मालूम होता था कि जैसे दिल में मीठे भावों का सोता खुल गया था। अपनी कवित्व शक्ति पर खुद अचम्भा होता था। क़लम हाथ में ली और रचना का सोता-सा बह निकला। ‘नैरंग’ में ऊँची कल्पनाऍं न हो, बड़ी गूढ़ बातें न हों, मगर उसका एक-एक शेर प्रवाह और रस, गर्मी और घुलावट की दाद दे रहा है। यह उस दीपक का वरदान है, जो अब मेरे दिल में जल गया था और रोशनी दे रहा था। यह उस फुल की महक थी जो मेरे दिल में खिला हुआ था। मुहब्बत रुह की खुराक है। यह अमृत की बूंद है जो मरे हुए भावों को जिंदा कर देती है। मुहब्बत आत्मिक वरदान है। यह जिंदगी की सबसे पाक, सबसे ऊँची, मुबारक बरक़त है। यही अक्सीर थी जिसकी अनजाने ही मुझे तलाश थी। वह रात कभी नहीं भूलेगी जब आयशा दुल्हन बनी हुई मेरे घर में आयी। ‘नैरंग’ उसकी मुबारक जिंदगी की यादगार है। ‘दुनियाए हुस्न’ एक कली थी, ‘नैरंग’ खिला हुआ फूल है और उस कली को खिलाने वाली कौन-सी चीज है? वही जिसकी मुझे अनजाने ही तलाश थी और जिसे मैं अब पा गया था।....उर्दू ‘प्रेम पचीसी’ से
समाप्त
20/04/08
अमृत भाग ३
खैर, इन गलत-बयानियों की तो मुझे परवाह न थी। अलबत्ता यह बड़ी फिक्र थी, फिक्र नहीं एक प्रबल जिज्ञासा थी, कि मेरी शायरी पर लोगों की जबान से क्या फतवा निकलता है। हमारी जिंदगी के कारनामे की सच्ची दाद मरने के बाद ही मिलती है क्योंकि उस वक्त वह खुशामद और बुराइयों से पाक-साफ होती हैं। मरने वाले की खुशी या रंज की कौन परवाह करता है। इसीलिए मेरी कविता पर जितनी आलोचनाऍं निकली हैं उसको मैंने बहुत ही ठंडे दिल से पढ़ना शुरु किया। मगर कविता को समझने वाली दृष्टि की व्यापकता और उसके मर्म को समझने वाली रुचि का चारों तरफ अकाल-सा मालूम होता था। अधिकांश जौहरियों ने एक-एक शेर को लेकर उनसे बहस की थी, और इसमें शक नहीं कि वे पाठक की हैसियत से उस शेर के पहलुओं को खूब समझते थे। मगर आलोचक का कहीं पता न था। नजर की गहराई गायब थी। समग्र कविता पर निगाह डालने वाला कवि, गहरे भावों तक पहुँचने वाला कोई आलोचक दिखाई न दिया।
एक रोज़ मैं प्रेतों की दुनिया से निकलकर घूमता हुआ अजमेर की पब्लिक लाइब्रेरी में जा पहुँचा। दोपहर का वक्त था। मैंने मेज पर झुककर देखा कि कोई नयी रचना हाथ आ जाये तो दिल बहलाऊँ। यकायक मेरी निगाह एक सुंदर पत्र की तरफ गयी जिसका नाम था ‘कलामें अख्तर’। जैसे भोला बच्चा खिलौने कि तरफ लपकता है उसी तरह झपटकर मैंने उस किताब को उठा लिया। उसकी लेखिका मिस आयशा आरिफ़ थीं। दिलचस्पी और भी ज्यादा हुई। मैं इत्मीनान से बैठकर उस किताब को पढ़ने लगा। एक ही पन्ना पढ़ने के बाद दिलचस्पी ने बेताबी की सूरत अख्तियार की। फिर तो मैं बेसुधी की दुनिया में पहुँच गया। मेरे सामने गोया सूक्ष्म अर्थो की एक नदी लहरें मार रही थी। कल्पना की उठान, रुचि की स्वच्छता, भाषा की नर्मी। काव्य-दृष्टि ऐसी थी कि हृदय धन्य-धन्य हो उठता था। मैं एक पैराग्राफ पढ़ता, फिर विचार की ताज़गी से प्रभावित होकर एक लंबी सॉँस लेता और तब सोचने लगता, इस किताब को सरसरी तौर पर पढ़ना असम्भव था। यह औरत थी या सुरुचि की देवी। उसके इशारों से मेरा कलाम बहुत कम बचा था मगर जहां उसने मुझे दाद दी थी वहां सच्चाई के मोती बरसा दिये थे। उसके एतराजों में हमदर्दी और प्रशंसा में भक्ति था। शायर के कलाम को दोषों की दृष्टियों से नहीं देखना चाहिये। उसने क्या नहीं किया, यह ठीक कसौटी नहीं। बस यही जी चाहता था कि लेखिका के हाथ और कलम चूम लूँ। ‘सफ़ीर’ भोपाल के दफ्तर से एक पत्रिका प्रकाशित हुई थी। मेरा पक्का इरादा हो गया, तीसरे दिन शाम के वक्त मैं मिस आयशा के खूबसूरत बंगले के सामने हरी-हरी घास पर टहल रहा था। मैं नौकरानी के साथ एक कमरे में दाखिल हुआ। उसकी सजावट बहुत सादी थी। पहली चीज़ पर निगाहें पड़ीं वह मेरी तस्वीर थी जो दीवार पर लटक रही थी। सामने एक आइना रखा हुआ था। मैंने खुदा जाने क्यों उसमें अपनी सूरत देखी। मेरा चेहरा पीला और कुम्हलाया हुआ था, बाल उलझे हुए, कपड़ों पर गर्द की एक मोटी तह जमी हुई, परेशानी की जिंदा तस्वीर थी।उस वक्त मुझे अपनी बुरी शक्ल पर सख्त शर्मिंदगी हुई। मैं सुंदर न सही मगर इस वक्त तो सचमुच चेहरे पर फटकार बरस रही थी। अपने लिबास के ठीक होने का यकीन हमें खुशी देता है। अपने फुहड़पन का जिस्म पर इतना असर नहीं होता जितना दिल पर। हम बुजदिल और बेहौसला हो जाते हैं।मुझे मुश्किल से पांच मिनट गुजरे होंगे कि मिस आयशा तशरीफ़ लायीं। सांवला रंग था, चेहरा एक गंभीर घुलावट से चमक रहा था। बड़ी-बड़ी नरगिसी आंखों से सदाचार की, संस्कृति की रोशनी झलकती थी। क़द मझोले से कुछ कम। अंग-प्रत्यंग छरहरे, सुथरे, ऐसे हल्की-फुल्की कि जैसे प्रकृति ने उसे इस भौतिक संसार के लिए नहीं, किसी काल्पनिक संसार के लिए सिरजा है। कोई चित्रकार कला की उससे अच्छी तस्वीर नही खींच सकता था। मिस आयशा ने मेरी तरफ दबी निगाहों से देखा मगर देखते-देखते उसकी गर्दन झुक गयी और उसके गालों पर लाज की एक हल्की-परछाईं नाचती हुई मालूम हुई। जमीन से उठकर उसकी ऑंखें मेरी तस्वीर की तरफ गयीं और फिर सामने पर्दे की तरफ जा पहुँचीं। शायद उसकी आड़ में छिपना चाहती थीं।मिस आयशा ने मेरी तरफ दबी निगाहों से देखकर पूछा—आप स्वर्गीय अख्तर के दोस्तों में से हैं?मैंने सिर नीचा किये हुए जवाब दिया--मैं ही बदनसीब अख्तर हूँ।आयशा एक बेखुदी के आलम में कुर्सी पर से खड़ी हुई और मेरी तरफ हैरत से देखकर बोलीं—‘दुनियाए हुस्न’ के लिखने वाले?अंधविश्वास के सिवा और किसने इस दुनिया से चले जानेवाले को देखा है? आयशा ने मेरी तरफ कई बार शक से भरी निगाहों से देखा। उनमें अब शर्म और हया की जगह के बजाय हैरत समायी हुई थी। मेरे कब्र से निकलकर भागने का तो उसे यकीन आ ही नहीं सकता था, शायद वह मुझे दीवाना समझ रही थी। उसने दिल में फैसला किया कि इस आदमी मरहूम शायर का कोई क़रीबी अजीज है। शकल जिस तरह मिल रही थी वह दोनों के एक खानदान के होने का सबूत थी। मुमकिन है कि भाई हो। वह अचानक सदमे से पागल हो गया है। शायद उसने मेरी किताब देखी होगी ओर हाल पूछने के लिए चला आया। अचानक उसे ख़याल गुजरा कि किसी ने अखबारों को मेरे मरने की झूठी खबर दे दी हो और मुझे उस खबर को काटने का मौका न मिला हो। इस ख़याल से उसकी उलझन दूर हुई, बोली—अखबारों में आपके बारे में एक निहायत मनहूस खबर छप गयी थी? मैंने जवाब दिया—वह खबर सही थी।अगर पहले आयशा को मेरे दिवानेपन में कुछ था तो वह दूर हो गया। आखिर मैने थोड़े लफ़्जो में अपनी दास्तान सुनायी और जब उसको यकीन हो गया कि ‘दुनियाए हुस्न’ का लिखनेवाला अख्तर अपने इन्सानी चोले में है तो उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्की सुर्खी दिखायी दी और यह हल्का रंग बहुत जल्द खुददारी और रुप-गर्व के शोख रंग से मिलकर कुछ का कुछ हो गया। ग़ालिबन वह शर्मिंदा थी कि क्यों उसने अपनी क़द्रदानी को हद से बाहर जाने दिया। कुछ देर की शर्मीली खामोशी के बाद उसने कहा—मुझे अफसोस है कि आपको ऐसी मनहूस खबर निकालने की जरुरत हुई।
क्रमश ....
19/04/08
अमृत भाग २
इसी दौरान मैंने फुटकर शेर तो बहुत कहे मगर दावतों और अभिनंदनपत्रों की भीड़ ने मार्मिक भावों को उभरने न दिया। प्रदर्शन और ख्याति एक राजनीतिज्ञ के लिए कोड़े का काम दे सकते हैं, मगर शायर की तबियत अकेले शांति से एक कोने के बैठकर ही अपना जौहर दिखालाती है। चुनांचे मैं इन रोज-ब-रोज बढ़ती हुई बेहूदा बातों से गला छुड़ा कर भागा और पहाड़ के एक कोने में जा छिपा। ‘नैरंग’ ने वहीं जन्म लिया।
नैरंग’ के शुरु करते हुए ही मुझे एक आश्चर्यजनक और दिल तोड़ने वाला अनुभव हुआ। ईश्वर जाने क्यों मेरी अक्ल और मेरे चिंतन पर पर्दा पड़ गया। घंटों तबियत पर जोर डालता मगर एक शेर भी ऐसा न निकलता कि दिल फड़के उठे। सूझते भी तो दरिद्र, पिटे हुए विषय, जिनसे मेरी आत्मा भागती थी। मैं अक्सर झुझलाकर उठ बैठता, कागज फाड़ डालता और बड़ी बेदिली की हालत में सोचने लगता कि क्या मेरी काव्यशक्ति का अंत हो गया, क्या मैंने वह खजाना जो प्रकृति ने मुझे सारी उम्र के लिए दिया था, इतनी जल्दी मिटा दिया। कहां वह हालत थी कि विषयों की बहुतायत और नाजुक खयालों की रवानी क़लम को दम नहीं लेने देती थी। कल्पना का पंछी उड़ता तो आसमान का तारा बन जाता था और कहां अब यह पस्ती! यह करुण दरिद्रता! मगर इसका कारण क्या है? यह किस क़सूर की सज़ा है। कारण और कार्य का दूसरा नाम दुनिया है। जब तक हमको क्यों का जवाब न मिले, दिल को किसी तरह सब्र नहीं होता, यहां तक कि मौत को भी इस क्यों का जवाब देना पड़ता है। आखिर मैंने एक डाक्टर से सलाह ली। उसने आम डाक्टरों की तरह आब-हवा बदलने की सलाह दी। मेरी अक्ल में भी यह बात आयी कि मुमकिन है नैनीताल की ठंडी आब-हवा से शायरी की आग ठंडी पड़ गई हो। छ: महीने तक लगातार घूमता-फिरता रहा। अनेक आकर्षक दृश्य देखे, मगर उनसे आत्मा पर वह शायराना कैफियत न छाती थी कि प्याला छलक पड़े और खामोश कल्पना खुद ब खुद चहकने लगे। मुझे अपना खोया हुआ लाल न मिला। अब मैं जिंदगी से तंग था। जिंदगी अब मुझे सूखे रेगिस्तान जैसी मालूम होती जहां कोई जान नहीं, ताज़गी नहीं, दिलचस्पी नहीं। हरदम दिल पर एक मायूसी-सी छायी रहती और दिल खोया-खोया रहता। दिल में यह सवाल पैदा होता कि क्या वह चार दिन की चांदनी खत्म हो गयी और अंधेरा पाख आ गया? आदमी की संगत से बेजार, हमजिंस की सूरत से नफरत, मैं एक गुमनाम कोने में पड़ा हुआ जिंदगी के दिन पूरे कर रहा था। पेड़ों की चोटियों पर बैठने वाली, मीठे राग गाने वाली चिड़िया क्या पिंजरे में ज़िंदा रह सकती हैं? मुमकिन है कि वह दाना खाये, पानी पिये मगर उसकी इस जिंदगी और मौत में कोई फर्क नहीं है।आखिर जब मुझे अपनी शायरी के लौटने की कोई उम्मीद नहीं रही, तो मेरे दिल में यह इरादा पक्का हो गया कि अब मेरे लिए शायरी की दुनिया से मर जाना ही बेहतर होगा। मुर्दा तो हूँ ही, इस हालत में अपने को जिंदा समझना बेवकूफी है। आखिर मैने एक रोज कुछ दैनिक पत्रों का अपने मरने की खबर दे दी। उसके छपते ही मुल्क में कोहराम मच गया, एक तहलका पड़ गया। उस वक्त मुझे अपनी लोकप्रियता का कुछ अंदाजा हुआ। यह आम पुकार थी, कि शायरी की दुनिया की किस्ती मंझधार में डूब गयी। शायरी की महफिल उखड़ गयी। पत्र-पत्रिकाओं में मेरे जीवन-चरित्र प्रकाशित हुए जिनको पढ़ कर मुझे उनके एडीटरों की आविष्कार-बुद्धि का क़ायल होना पड़ा। न तो मैं किसी रईस का बेटा था और न मैंने रईसी की मसनद छोड़कर फकीरी अख्तियार की थी। उनकी कल्पना वास्तविकता पर छा गयी थी। मेरे मित्रों में एक साहब ने, जिन्हे मुझसे आत्मीयता का दावा था, मुझे पीने-पिलाने का प्रेमी बना दिया था। वह जब कभी मुझसे मिलते, उन्हें मेरी आखें नशे से लाल नजर आतीं। अगरचे इसी लेख में आगे चलकर उन्होनें मेरी इस बुरी आदत की बहुत हृदयता से सफाई दी थी क्योंकि रुखा-सूखा आदमी ऐसी मस्ती के शेर नहीं कह सकता था। ताहम हैरत है कि उन्हें यह सरीहन गलत बात कहने की हिम्मत कैसे हुई।
क्रमश...
18/04/08
अर्मत भाग १
अर्मत
मेरी उठती जवानी थी जब मेरा दिल दर्द के मजे से परिचित हुआ। कुछ दिनों तक शायरी का अभ्यास करता रहा और धीर-धीरे इस शौक ने तल्लीनता का रुप ले लिया। सांसारिक संबंधो से मुंह मोड़कर अपनी शायरी की दुनिया में आ बैठा और तीन ही साल की मश्क़ ने मेरी कल्पना के जौहर खोल दिये। कभी-कभी मेरी शायरी उस्तादों के मशहूर कलाम से टक्कर खा जाती थी। मेरे क़लम ने किसी उस्ताद के सामने सर नहीं झुकाया। मेरी कल्पना एक अपने-आप बढ़ने वाले पौधे की तरह छंद और पिंगल की क़ैदो से आजाद बढ़ती रही और ऐसे कलाम का ढंग निराला था। मैंने अपनी शायरी को फारस से बाहर निकाल कर योरोप तक पहुँचा दिया। यह मेरा अपना रंग था। इस मैदान में न मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी था, न बराबरी करने वाला बावजूद इस शायरों जैसी तल्लीनता के मुझे मुशायरों की वाह-वाह और सुभानअल्लाह से नफ़रत थी। हां, काव्य-रसिकों से बिना अपना नाम बताये हुए अक्सर अपनी शायरी की अच्छाइयों और बुराइयों पर बहस किया करता। तो मुझे शायरी का दावा न था मगर धीरे-धीरे मेरी शोहरत होने लगी और जब मेरी मसनवी ‘दुनियाए हुस्न’ प्रकाशित हुई तो साहित्य की दुनिया में हल-चल-सी मच गयी। पुराने शायरों ने काव्य-मर्मज्ञों की प्रशंसा-कृपणता में पोथे के पोथे रंग दिये हैं मगर मेरा अनुभव इसके बिलकुल विपरीत था । मुझे कभी-कभी यह ख़याल सताया करता कि मेरे कद्रदानों की यह उदारता दूसरे कवियों की लेखनी की दरिद्रता का प्रमाण है। यह ख़याल हौसला तोउ़ने वाला था। बहरहाल, जो कुछ हुआ, ‘दुनियाए हुस्न’ ने मुझे शायरी का बादशाह बना दिया। मेरा नाम हरेक ज़बान पर था। मेरी चर्चा हर एक अखबार में थी। शोहरत अपने साथ दौलत भी लायी। मुझे दिन-रात शेरो-शायरी के अलावा और कोई काम न था। अक्सर बैठे-बैठे रातें गुज़र जातीं और जब कोई चुभता हुआ शेर कलम से निकल जाता तो मैं खुशी के मारे उछल पड़ता। मैं अब तक शादी-ब्याह की कैंदों से आजाद़ था या यों कहिए कि मैं उसके उन मजों से अपरिचित था जिनमें रंज की तल्खी भी है और खुशी की नमकीनी भी। अक्सर पश्चिमी साहित्यकारों की तरह मेरा भी ख्याल था कि साहित्य के उन्माद और सौन्दर्य के उन्माद में पुराना बैर है। मुझे अपनी जबान से कहते हुए शर्मिन्दा होना पड़ता है कि मुझे अपनी तबियत पर भरोसा न था। जब कभी मेरी आँखों में कोई मोहिनी सूरत घूम जाती तो मेरे दिल-दिमाग पर एक पागलपन-सा छा जाता। हफ्तों तक अपने को भूला हुआ-सा रहता। लिखने की तरफ तबियत किसी तरह न झुकती। ऐसे कमजोर दिल में सिर्फ एक इश्क की जगह थी। इसी डर से मैं अपनी रंगीन ततिबयत के खिलाफ आचरण शुद्ध रखने पर मजबूर था। कमल की एक पंखुड़ी, श्यामा के एक गीत, लहलहाते हुए एक मैदान में मेरे लिए जादू का-सा आकर्षण था मगर किसी औरत के दिलफ़रेब हुस्न को मैं चित्रकार या मूर्तिकार की बैलौस ऑंखों से नहीं देख सकता था। सुंदर स्त्री मेरे लिए एक रंगीन, क़ातिल नागिन थी जिसे देखकर ऑंखें खुश होती हैं मगर दिल डर से सिमट जाता है।खैर, ‘दुनियाए हुस्न’ को प्रकाशित हुए दो साल गुजर चुके थे। मेरी ख्याति बरसात की उमड़ी हुई नदी की तरह बढ़ती चली जाती थी। ऐसा मालूम होता था जैसे मैंने साहित्य की दुनिया पर कोई वशीकरण कर दिया है।
यह रचना मुशीं प्रेमचन्द जी की हे.
क्रमश..
17/04/08
शेख मखमूर अन्तिम भाग
क्रमश से आगे...
शेख मखमूर
हॉँ, ठीक उस वक्त जब जोकि वह मलिका के हाथ को चूम रहा था, उसकी जिन्दगी भर की लालसाएं आँसू की एक बूँद बनकर मलिका की मेंहदी-रची हथेली पर गिर पड़ी कि जैसे मसऊद ने अपनी लालसा का मोती मलिका को सौंप दिया। मलिका ने हाथ खींच लिया और फकीर मखमूर के चेहरे पर मुहब्बत से भरी हुई निगाह डाली। जब सल्तनत के सब दरबारी भेंट दे चुके, तोपों की सलामियॉँ दगने लगीं, शहर में धूमधाम का बाजार गर्म हो गया और खुशियों के जलसे चारों तरफ नजर आने लगे।
राजगद्दी के तीसरे दिन मसऊद खुदा की इबादत में बैठा हुआ था कि मलिका शेर अफगन अकेले उसके पास आयी और बोली, मसऊद, मैं एक नाचीज तोहफा तुम्हारे लिए लायी हूँ और वह मेरा दिल है। क्या तुम उसे मेरे हाथ से कबूल करोगे? मसऊद अचम्भे से ताकता रह गया, मगर जब मलिका की आँखें मुहब्बत के नशे में डूबी हुई पायी तो चाव के मारे उठा और उसे सीने से लगाकर बोला-मैं तो मुद्दत से तुम्हारी बर्छी की नोक का घायल हूँ, मेरी किस्मत है कि आज तुम मरहम रखने आयी हो।
ल्के जन्नतनिशॉँ अब आजादी और खुशहाली का घर है। मलिका शेर अफगान को अभी गद्दी पर बैठे साल भर से ज्यादा नहीं गुजरा मगर सल्तनत का कारबार बहुत अच्छी तरह और खूबी से चल रहा है और इस बड़े काम में उसका प्यारा शौहर मसऊद, जो अभी तक फकीर मखमूर के नाम से मशहूर है, उसका सलाहकार और मददगार है।
रात का वक्त था, शाही दरबार सजा हुआ था, बड़े-बड़े वजीर अपने पद के अनुसार बैठे हुए थे और नौकर जर्क-बर्क वर्दियॉँ पहने हाथ बॉँधे खड़े थे कि एक खिदमतगार ने आकर अर्ज की-दोनों जहान की मलिका, एक गरीब औरत बाहर खड़ी है और आपके कदमों का बोसा लेने की गुजारिश करती है। दरबारी चौंके और मलिका ने ताज्जुब-भरे लहजे में कहा- अन्दर हाजिर करो। खिदमतगार बाहर चला गया और जरा देर में एक बुढ़िया लाठी टेकती हुई आयी और अपनी पिटारी से एक जड़ाऊ ताज निकालकर बोली तुम लोग इसे ले लो, अब यह मेरे किसी काम का नहीं रहा। मियॉँ ने मरते वक्त इसे मसऊद को देकर कहा था कि तुम इसके मालिक हो, मगर अपने जिगर के टुकड़े मसऊद को ढूँढूँ? रोते-रोते अंधी हो गयी, सारी दुनिया की खाक छानी, मगर उसका कहीं पता न लगा। अब जिंदगी से तंग आ गयी हूँ, जीकर क्या करूँगी? यह अमानत मेरे पास है, जिसका जी चाहे ले लो।
दरबार में सन्नाटा छा गया। लोग हैरत के मारे मूरत बन गये, कि जैसे एक जादूगर था जो उँगली के इशारे से सबका दम बन्द किए हुआ था। यकाएक मसऊद अपनी जगह से उठा और रोता हुआ जाकर रिन्दा के पैरों पर गिर पड़ा। रिन्दा अपने जिगर के टुकड़े को देखते ही पहचान गयी; उसे छाती से लगा लिया और वह जड़ाऊ ताज उसके सर पर रखकर बोली-साहबो, यही प्यारा मसऊद और शाहे बासुराद का बेटा है, तुम लोग इसकी रिआया हो, यह ताज इसका है, यह मुल्क इसका है और सारी खिलकत इसकी है। आज से वह अपने मुल्क का बादशाह है, अपनी कौम का खादिम।
दरबार में कयामत का शोर मचने लगा, दरबारी उठे और मसऊद को हाथों-हाथ ले जाकर तख्त पर मलिका शेर अफगन के बगल में बिठा दिया। भेंटें दी जाने लगीं, सलामियॉँ दगने लगीं, नफीरियों ने खुशी का गीत गाया और बाजों ने जीत का शोर मचाया। मगर जब जोश की यह खुशी जरा कम हुई और लोगों ने रिन्दा को देखा तो वह मर गयी थी। आरजुओं के पूरे होते ही जान निकल गयी। गोया आरजुऍं रूह बनकर उसके मिट्टी के तन को जिन्दा रखे हुए थीं।
समाप्त
16/04/08
शेख मखमूर भाग ६
क्रमश से आगे...
शेख मखमूर
इस पुरजोश, तकरीर ने सरदारों के हौसले उभार दिये। उनकी आंखें लाल हो गईं, तलवारें पहलू बदलने लगीं और कदम बरबस लड़ाई के मैदान की तरफ बढ़े। शेख मखमूर ने तब फकीरी बाना उतार फेंका, फकीरी प्याले को सलाम किया और हाथों में वही तलवार और ढाल लेकर, जो किसी वक्त मसऊद से छीन गये थे, सरदार नमकखोर के साथ-साथ सिपाहियों और अफसरों का दिल बढ़ाते शेरों की तरह बिफरता हुआ चला। आधी रात का वक्त था, अमीर के सिपाही अभी मंजिलें मारे चले आते थे। बेचारे दम भी न लेने पाये थे कि एकाएक सरदार नमकखोर के आ पहुँचने की खबर पाई। होश उड़ गये और हिम्मतें टूट गईं। मगर अमीर शेर की तरह गरजकर खेमे से बाहर आया और दम के दम में अपनी सारी फौज दुश्मन के मुकाबले में कतार बॉँधकर खड़ी कर दी कि जैसे माली था कि आया और इधर-उधर बिखरे हुए फूलों को एक गुलदस्ते में सजा गया।
दोनों फौजें काले-काले पहाड़ों की तरह आमने-सामने खड़ी हैं। और तोपों का आग बरसाना ज्वालामुखी का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। उनकी धनगरज आवाज से बला का शोर मच रहा था। यह पहाड़ धीरे धीरे आगे बढ़ते गये। यकायक वह टकराये और कुछ इस जोर से टकराये कि जमीन कॉँप उठी और घमासान की लड़ाई शुरू हो गई। मसऊद का तेगा इस वक्त एक बला हो रहा था, जिधर पहुँचता लाशों के ढेर लग जाते और सैकड़ों सर उस पर भेंट चढ़ जाते।
पौ फटे तक तेगे यों ही खड़का किये और यों ही खून का दरिया बहता रहा। जब दिन निकला तो लड़ाई का मैदान मौता का बाजार हो रहा था। जिधर निगाह उठती थी, मरे हुओं के सर और हाथ-पैर लहू में तैरते दिखाई देते थे। यकायक शेख मखमूर की कमान से एक तीर बिजली बनकर निकला और अमीर पुरतबीर की जान के घोंसले पर गिरा और उसके गिरते ही शाही फौज भाग निकली और सरदारी फौज फतेह का झण्डा उठाये राजधानी की तरफ बढ़ी।
औरत, जो बड़ी मुद्दत से गुलामी की सख्तियॉँ झेल रहे थे, उसकी अगवानी के लिए निकल पड़े। सारा शहर उमड़ आया। लोग सिपाहियों को गले लगाते थे और उन पर फूलों की बरखा करते थे कि जैसे बुलबुलें थीं जो बहेलिये के पंजे से रिहाई पाने पर बाग में फूलों को चूम रही थीं। लोग शेख मखमूर के पैरों की धूल माथे से लगाते थे और सरदार नमकखोर के पैरों पर खुशी के ऑंसू बहाते थे। अब मौका था कि मसऊद अपना जोगिया भेस उतार फेंके और ताजोतख्त का दावा पेश करे। मगर जब उसने देखा कि मलिका शेर अफगन का नाम हर आदमी की जबान पर है तो खामोश हो रहा। वह खूब जानता था कि अगर मैं अपने दावे को साबित कर दूँ तो मलिका का दावा खत्म हो जायेगा। मगर तब भी यह नामुमकीन था कि सख्त मारकाट के बिना यह फैसला हो सके। एक पुरजोश और आरजूमन्द दिल के लिए इस हद जब्त करना मामूली बात न थी। जब से उसने होश संभाला, यह ख्याल कि मैं इस मुल्क का बादशाह हूँ, उसके रगरेशे में घुल गया था। शाह बामुराद की वसीयत उसे एक दम को भी न भूलती थी। दिन को यह बादशाहत के मनसूबे बाँधता और रात को बादशाहत के सपने देखता। यह यकीन कि मैं बादशाह हूँ उसे बादशाह बनाये हुए था। अफसोस, आज वह मंसूबे टूट गये और वह सपना तितर बितर हो गया। मगर मसऊद के चरित्र में मर्दाना जब्त अपनी हद पर पहुँच गया था। उसने उफ तक न की, एक ठंडी आह भी न भरी, बल्कि पहला आदमी, जिसने मलिका के हाथों को चूमा और उसको सामने सर झुकाया, वह फकीर मखमूर था।
क्रमश...
15/04/08
शेख मखमूर भाग ५
क्रमश से आगे...
शेख मखमूर
मसऊद ने फकीरों का भेष अख्तियार किया, सर पर लोहे की टोपी के बजाय लम्बी जटाएं बनायीं, जिस्म पर जिरहबख्तर के बजाय गेरुए रंगा का बाना सजा हाथ में तलवार के बजाय फकीरों का प्याला लिया। जंग के नारे के बजाय फकीरों की सदा बुलन्द की ओर अपना नाम शेख मखमूर रख दिया। मगर यह जोगी दूसरे जोगियों की तरह धूनी रमाकर न बैठा और न उस तरह का प्रचार शुरू किया। वह दुश्मन की फौज में जाता और सिपाहियों की बातें सुनता। कभी उनकी मोर्चेबन्दियों पर निगाह दौड़ाता, कभी उनके दमदमों और किलों की दीवारों का मुआइना करता। तीन बार सरदार नमकखोर दुश्मन के पंजे से ऐसे वक्त निकले जबकि उन्हें जान बचने की कोई आस न रही थी। और यह सब शेख मखमूर की करामात थी। मिनकाद का किला जीतना कोई आसान बात न थी। पाँच हजार बहादुर सिपाही उसकी हिफाजत के लिए कुर्बान होने को तैयार बैठे थे। तीस तोपें आग के गोले उगलने के लिये मुंह खोले हुए थीं और दो हजार सधे हुए तीरन्दाज हाथों में मौत का पैगाम लिये हुए हुक्म का इन्तजार कर रहे थे। मगर जिस वक्त सरदार नमकखोर अपने दो हजार बहादुरों के साथ इस किले पर चढ़ा हो गये और तीरन्दाजों के तीर हवा में उड़ने लगे। और वह सब शेख मखमूर की करामात थी। शाह साहब वहीं मौजूद थे। सरदार दौड़कर उनके कदमों पर गिर पड़ा और उनके पैरों की धुल माथे पर लगायी।
शवरकुशा दोयम का दरवार सजा हुआ है। अंगूरी शराब का दौर चल रहा है और दरबार के बड़े-बड़े अमीर और रईस अपने दर्जे के हिसाब से अदब के साथ घुटना मोड़े बैठे हैं। यकायक भेदियों ने खबर दी कि मीर शुजा की हार हुई और जान से मारे गये। यह सुनकर किशवरकुशा के चेहरे पर चिन्ता दिलेर कौन है जो इस बदमाश सरदार का सर कलम करके हमारे सामने पेश करे। इसकी गुस्ताखियॉँ अब हद से आगे बढ़ी जाती हैं। आप ही लोगों के बड़े-बूढ़ों ने यह मुल्क तलवार के कजोर से मुरादिया खानदान से छीना था। क्या आप उन्हीं पूरखों की औलाद नहीं है? यह सुनते ही सरदारों में एक सन्नाटा छा गया, सबके चेहरे पर हवाइयॉँ उड़ने लगीं और किसी की हिम्मत न पड़ी कि बादशाह की दावत कबूल करे। आखिरकार शाह किशवरकुशा के बुड्ढे चचा खुद उठे और बोले-ऐ शाह जवॉँबख्त! मैं तेरी दावत कबूल करता हूँ, अगरचे मैं बुड्ढा हो गया हूँ और बाजुओं में तलवार पकड़ने की ताकत बाकी नहीं रही, मगर मेरे खून में वही गर्मी और दिल में वही जोश है जिसकी बदौलत हमने यह मुल्क शाह बामुराद से लिया था। या तो मैं इस नापाक कुत्ते की हस्ती खाक में मिला दूँगा या इस कोशिश में अपनी जान निसार कर दूँगा, ताकि अपनी ऑंखों से सल्तनत की बर्बादी न देखूँ। यह कहकर अमीर पुरतदबीर वहॉँ से उठा और मुस्तैदी से जंगी तैयारियों में लग गया। उसे मालूम था कि यह आखिरी मुकाबिला है और अगर इसमें नाकाम रहे तो मर जाने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। उधर सरदार नमकखोर धीरे-धीरे राजधानी की तरफ बढ़ता आता था, यकायक उसे खबर मिली कि अमीर पुरतदबीर बीस हजार पैदल और सवारों के साथ मुकाबिले के लिए आ रहा है।
यह सुनते ही सरदार नमकखोर की हिम्मतें छुट गयी। अमीर पुरतदबीर बुढ़ापे के बावजूद अपने वक्त का एक ही सिपहसालार था। उसका नाम सुनकर बड़े-बड़े बहादुर कानों पर हाथ रख लेते थे। सरदार नमकखोर का खयाल था कि अमीर कहीं एक कोने में बैठे खुदा की इबादत करते होंगे। मगर उनको अपने मुकाबिले में देखकर उसके होश उड़ गये कि कहीं ऐसा न हो कि इस हार से हम अपनी सारी जीत खो बैठें और बरसों की मेहनत पर पानी फिर जाय। सबकी यही सलाह हुई कि वापस चलना ही ठीक है। उस वक्त शेख मखमूर ने कहा-ऐ सरदार नमकखोर ! तूने मुल्के जन्नतनिशॉँ को छुटकारा दिलाने का बीड़ा उठाया है। क्या इन्हीं हिम्मतों से तेरी आरजुएँ पूरी होंगी? तेरे सरदार और सिपाहियों ने कभी मैदान से कदम पीछे नहीं हटाया, कभी पीठ नहीं दिखायी, तीरों की बौछार को तुमने पानी की फुहार समझा और बन्दूकों की बाढ़ को फूलों की बहार। क्या इन चीजों से इतनी जल्दी तुम्हारा जी भर गया? तुमने यह लड़ाई सल्तनत को बढ़ाने के कमीने इरादे से नहीं छेड़ी है। तुम सच्चाई और इन्साफ की लड़ाई लड़ रहे हो। क्या तुम्हारा जोश इतनी जल्द ठंडा हो गया? क्या तुम्हारी इंसाफ की तलवार की प्यास इतनी जल्द बुझ गयी? तुम खूब जानते हो कि इंसाफ और सच्चाई की जीत जरूर होगी, तुम्हारी इन बहादुरियों का इनाम खुदा के दरबार से जरूर मिलेगा। फिर अभी से क्यों हौसले छोड़े देते हो? क्या बात है, अगर अमीर पुरतदबीर बड़ा दिलेर और इरादे का पक्का सिपाही है? अगर वह शेर है तो तुम शेर मर्द हो; अगर उसकी तलवार लोहे की है तो तुम्हारा तेगा फौलाद का है; अगर उसके सिपाही जान पर खेलनेवाले हैं तो तुम्हारे सिपाही भी सर कटाने के लिए तैयार हैं। हाथों में तेगा मजबूत पकड़ो और खुदा का नाम लेकर दुश्मन पर टूट पड़ो। तुम्हारे तेवर कहे देते हैं कि मैदान तुम्हारा है।
क्रमश.....
14/04/08
शेख मखमूर भाग ४
क्रमश से आगे...
शेख मखमूर
मसऊद ने चुने हुए सिपाहियों का एक दस्ता तैयार किया और कुछ इस दमखम और कुछ इस जोशखरोश से मीर शुजा पर टूटा कि उसकी सारी फौज में खलबली पड़ गयी। सरदार नमकखोर ने जब देखा कि शाही फौज के कदम डगमगा रहे हैं, तो अपनी पूरी ताकत से बादल और बिजली की तरह लपका और तेगों से तेगें और बर्छियों से बर्छियॉँ खड़कने लगीं। तीन घंटे तक बला का शोर मचा रहा, यहॉँ तक कि शाही फौज के कदम उखड़ गये और वह सिपाही जिसकी तलवार मीर शुजा से गले मिली मसऊद था।
तब सरदारी फौज और अफसर सब के सब लूट के माल पर टूटे और मसऊद जख्मों से चूर और खून में रँगा हूआ अपने कुछ जान पर खेलनेवाले दस्तों के साथ मस्कात के किले की तरफ लौटा मगर जब होश ने आंखें खोलीं और हवास ठिकाने हुए तो क्या देखता है कि वह एक सजे हुए कमरे में मखमली गद्दे पर लेटा हुआ है। फूलों की सुहानी महक और लम्बी छरहरी सुन्दरियों के जमघट से कमरा चमन बना हुआ था। ताज्जुब से इधर-उधर ताकने लगा कि इतने में एक अप्सरा-जैसी सुन्दर युवती तश्त में फूलों का हार लिये धीरे-धीरे आती हुई दिखायी दी कि जैसे बहार फूलों की डाली पेश करने आ रही है। उसे देखते ही उन लंबी छरहरी सुन्दरियों ने आंखें बिछायीं और उसकी हिनाई हथेली को चूमा। मसऊद देखते ही पहचान गया। यह मलिका शेर अफगान थी।
मलिका ने फूलों का हार मसऊद के गले में डाला। हीरे-जवाहरात उस पर चढ़ाये और सोने के तारों से टँकी हुई मसनद पर बड़ी आन-बान से बैठ गयी। साजिन्दों ने बीन ले-लेकर विजयी अतिथि के स्वागत में सुहागे राग अलापने शुरू किये।
यहॉँ तो नाच-गाने की महफिल थी, उधर आपसी डाह ने नये-नये शिगूफे खिलाये। सरदार ने शिकायत की कि मसऊद जरूर दुश्मन से जा मिला है और आज जान-बूझकर फौज का एक दस्ता लेकर लड़ने को गया था ताकि उसे खाक और खून में सुलाकर सरदारी फौज को बेचिराग कर दे। इसके सबूत में कुछ जाली खत भी दिखाये गये और इस कमीनी कोशिश में जबान की ऐसी चालाकी ने काम लिया कि आखिर सरदार को इन बातों पर यकीन आ गया। पौ फटे जब मसऊद मलिका शेर अफगन के दरबार से विजय का हार गले में डाले सरदार को बधाई देने गया तो बजाय इसके कि कद्रदानी का सिरोपा और बहादुरी का तमगा पाये, उसकी खरी-खोटी बातों के तीर का निशाना बनाया गया और हुक्म मिला कि तलवार कमर से खोलकर रख दे।
मसऊद स्तम्भित रह गया। ये तेगा मैंने अपने बाप से विरसे में पाया है और यह मेरे पिछले बड़प्पन कि आखिरी यादगार है। यह मेरी बॉँहों की ताकत और मेरा सहयोगी और मददगार है। इसके साथ कैसी स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, क्या मैं जीते जी इसे अपने पहलू से अलग कर दूँ? अगर मुझ पर कोई आदमी लड़ाई के मैदान से कदम हटाने का इलजाम लगा सकता, अगर कोई शख्त इस तेगे का इस्तेमाल मेरे मुकाबिले में ज्यादा कारगुजारी के साथ कर सकता, अगर मेरी बॉँहों में तेग पकड़ने की ताकत न होती तो खुदा की कसम, मैं खुद ही तेगा कमर से खोलकर रख देता। मगर खुदा का शुक्र है कि मैं इन इल्जामों से बरी हूँ। फिर क्यों मैं इसे हाथ से जाने दूँ? क्या इसलिए कि मेरी बुराई चाहनेवाले कुछ थोड़-से डाहियों ने सरदार नमकखोर का मन मेरी तरफ से फेर दिया है? ऐसा नहीं हो सकता।
मगर फिर उसे ख्याल आया, मेरी सरकशी पर सरदार और भी गुस्सा हो जायेंगे और यकीनन मुझे तलवार शमशीर के जोर से छीन ली जायेगी। ऐसी हालत में मेरे ऊपर जान छिड़कनेवाले सिपाही कब अपने को काबू में रख सकेंगे। जरूर आपस में खून की नदियॉँ बहेंगी और भाई-भाई का सिर कटेगा। खुदा न करे कि मरे सबब से यह दर्दनाक मार-काट हो। यह सोचकर उसने चुपके से शमशीर सदरार नमकखोर के बगल में रख दी और खुद सर नीचा किये जब्त की इन्तहाई कुवत से गुस्से को दबाता हुआ खेमे से बाहर निकल आया।
मसऊद पर सारी फौज गर्व करती थी और उस पर जानें वारने के लिए हथेली में लिये रहती थी। जिस वक्त उसने तलवार खोली है, दो हजार सूरमा सिपाही मियान पर हाथ रक्खे और शोले बरसाती हुई आँखों से ताकते कनौतियॉँ बदल रहे थे। मसऊद के एक जरा-से इशारे की देर थी और दम के दम में लाशों के ढेर लग जाते। मगर मसऊद बहादुरी ही में बेजोड़ न था, जब्त और धीरज में भी उसका जवाब न था। उसने यह जिल्लत और बदनामी सब गवार की, तलवार देना गवारा किया, बगावत का इलजाम लेना गवारा किया और अपने साथियों के सामने सर झुकाना गवारा किया मगर यह गवारा न किया कि उसके कारण फौज में बगावत और हुक्म न मानने का ख्याल पैदा हो। और ऐसे नाजुक वक्त में जबकि कितने ही दिलेर, जिन्होंने लड़ाई की आजमाइश में अपनी बहादुरी का सबूत दिया था, जब्त हाथ से खो बैठते और गुस्से की हालत में एक-दूसरे के गले काटते, खामोश रहा और उसके पैर नहीं डगमगाये। उसकी बहादुरी का सबूत दिया खामोश रहा और उसके पैर नहीं डगमगाये। उसकी परेशानी पर जरा भी बल न आया, उसके तेवर जरा भी न बदले। उसने खून बरसाती हुई आँखों से दोस्तों को अलविदा कहा और हसरत भरा दिल लिये उठा और एक गुफा में छिप बैठा और जब सूरज डूबने पर वहॉँ से उठा तो उसके दिल ने फैसला कर लिया था कि बदनामी का दाग माथे से मिटाऊँगा और डाहियों को शर्मिन्दगी के गड्ढे में गिराऊँगा।
क्रमश
13/04/08
शेख मखमूर भाग ३
शेख मखमूर
मसऊद का जिस्म जख्मों से छलनी हो गया। खून के फव्वारे जारी थे और खून की प्यासी तलवारें जबान खोले बार-बार उसकी तरफ लपकती थीं और उसका खून चाटकर अपनी प्यास बुझा लेती थीं। कितनी ही तलवारें उसकी ढाल से टकराकर टूट गयीं, कितने ही बहादुर सिपाही जख्मी होकर तड़पने लगे और कितने ही उस दुनिया को सिधारे। मगर मसऊद के हाथ में वह आबदार शमशीर ज्यों की त्यों बिजली की तरह कौंधती और सुथराव करती रही। यहॉँ तक कि इस फन के कमाल को समझने वाली मलिका ने खुद उसकी तारीफ का नारा बुलन्द किया। और उस तेग को चूमकर बोली-मसऊद! तू बहादुरी के समन्दर का मगर है। शेरों के शिकार में वक्त बर्बाद मत कर। दुनिया में शिकार के अलावा और भी ऐसे मौंके हैं जहां तू अपने आबदार तेग का जौहर दिखा सकता है। जा और मुल्कोकौम की खिदमत कर। सैरोशिकार हम जैसी औरतों के लिए छोड़ दे।
मसऊद के दिल ने गुदगुदाया, प्यार की बानी जबान तक आयी मगर बाहर निकल न सकी और उसी वक्त वह अपने दिल में किसी की पलकों की टीस लिये हुए तीन हफ्तों के बाद अपनी बेकरार मां के कदमों पर जा गिरा।
नमकखोर सरदार की फौज रोज ब रोज बढ़ने लगी। पहले तो वह अंधेरे के पर्दे में शाही खजानों पर हाथ बढ़ाता रहा, धीरे-धीरे एक बाकायदा फौज तैयार हो गयी, यहॉँ तक कि सरदार को शाही फौजों के मुकाबले में अपनी तलवार आजमाने का हौसला हुआ, और पहली लड़ाई में चौबीस किले इस नयी फौज के हाथ आ गये। शाही फौज ने लड़ने में जरा भी कसर न की। मगर वह ताकत, वह जोश, वह जज्बा, जो सरदार नमकखोर और उसके दोस्तों के दिलों को हिम्मत के मैदान में आगे बढ़ाता रहता था, किशवरकुशा दोयम के सिपाहियों में गायब था। लड़ाई के कलाकौशल, हथियारों की खूबी और ऊपर दिखाई पड़ने वाली शान-शौकत के लिहाज से दोनों फौजों का कोई मुकाबला न था। बादशाह के सिपाही लहीम-शहीम, लम्बे-तड़ंगे और आजमाये हुए थे। उनके साज-सामान और तौर-तरीके से देखने वालों के दिलों पर एक डर-सा छा जाता था और वहम भी यह गुमान न कर सकता था कि इस जबर्दस्त जमात के मुकाबले में निहस्थी-सी, अधनंगी और बेकायदा सरदारी फौज एक पल के लिए भी पैर जमा सकेगी। मगर जिस वक्त ‘मारो’ की दिल बढ़ानेवाली पुकार हवा में गूंजी, एक अजीबोगरीब नजारा सामने आया। सरदार के सिपाही तो नारे मारकर आगे धावा करते थे और बादशाह की फौज भागने की राह पर दबी हुई निगाहें डालती थी। दम के दम में मोर्चे गुबार की तरह फट गए और जब मस्कात के मजबूत किले में सरदार नमकखोर शाही किलेदार की मसनद पर अमीराना ठाट-बाट से बैठा और अपनी फौज की कारगुजारियों और जॉँबाजियों का इनाम देने के लिए एक तश्त में सोने के तमंगे मँगवाकर रक्खे तो सबसे पहले जिस सिपाही का नाम पुकारा गया वह नौजवान मसऊद था।
मसऊद पर इस वक्त उसकी फौज घमंड करती थी। लड़ाई के मैदान में सबसे पहले उसी की तलवार चमकती थी और धावे के वक्त सबसे पहले उसी के कदम उठाते थे। दुश्मन के मोर्चों में ऐसा बेधड़क घुसता था जैसे आसमान में चमकता हुआ लाल तारा। उसकी तलवार के वार कयामत थे और उसके तीर का निशाना मौत का संदेश।
मगर टेढ़ी चाल की तकदीर से उसका यह प्रताप, यह प्रतिष्ठा न देखी गई। कुछ थोड़े-से आजमाये हुए अफसर, जिनके तेगों की चमक मसऊद के तेग के सामने मन्द पड़ गई थी, उससे खार खाने लगे और उसे मिटा देने की तदबीरें सोचने लगे। संयोग से उन्हें मौका भी जल्द हाथ आ गया। किशवरकुशा दोयम ने बागियों को कुचलने के लिए अब की एक जबर्दस्त फौज रवाना की और मीर शुजा को उसका सिपहसालार बनाया जो लड़ाई के मैदान में अपने वक्त का इसफंदियार था। सरदार नमकखोर ने यह खबर पायी तो हाथ-पांव फूल गये। मीर शुजा के मुकाबले में आना अपनी हार को बुलाना था। आखिरकार यह राय तय पायी कि इस जगह से आबादी का निशान मिटाकर हम लोग किलेबन्द हो जाएं। उस वक्त नौजवान मसऊद ने उठकर बड़े पुरजोश लहजे में कहा:
‘नहीं, हम किलेबंद न होंगे, हम मैदान में रहेंगे और हाथोंहाथ दुश्मन का मुकाबला करेंगे। हमारे सीनों की हड्डियां ऐसी कमजोर नहीं हैं कि तीर-तुपुक के निशाने बर्दाश्त न कर सकें। किलेबन्द होना इस बात का ऐलान है कि हम आमने-सामने नहीं लड़ सकते। क्या आप लोग, जो शाह बामुराद के नामलेवा हैं, भूल गये कि इसी मुल्क पर उसने अपने खानदान के तीन लाख सपूतों को फूल की तरह चढ़ा दिया? नहीं, हम हरगिज किलेबन्द न होंगे। हम दुश्मन के मुकाबले में ताल ठोंककर आयेंगे और अगर खुदा इन्साफ करने वाला है तो जरूर हमारी तलवारें दुश्मनों से गले मिलेंगी और हमारी बर्छियां उनके पहलू में जगह पायेंगी।‘
सैंकड़ों निगाहे मसऊद के पुरजोश चेहरे की तरफ उठ गयी। सरदारों की त्योरियों पर बल पड़ गये और सिपाहियों के सीने जोश से धड़कने लगे। सरदार नमकखोर ने उसे गले से लगा लिया और बोले-मसऊद, तेरी हिम्मत और हौसले की दाद देता हूँ। तू हमारी फौज की शान है। तेरी सलाह मर्दाना सलाह है। बेशक हम किलेबंद न होंगे। हम दुश्मन के मुकाबले में ताल ठोंककर आयेंगे और अपने प्यारे जन्नतनिशॉँ के लिए अपना खून पानी की तरह बहायेंगे। तू हमारे लिए आगे-आगे चलनेवाली मशाल है और हम सब आज इसी रोशनी में कदम आगे बढ़ायेंगे।
क्रमश....